राष्ट्रपति देश के सर्वोच्च नागरिक के साथ देश की सुरक्षा, अस्मिता के साथ में लोगों की दिन प्रतिदिन की समस्याओं का समाधान करवाने के लिए ही, भारत की जनता ने उन्हें इस मान सम्मान के साथ, सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर समाधान की सलाह ,भारत सरकार के उच्च अधिकारियों को दे। लेकिन , इस संदर्भ में राष्ट्रपति को , बच्चों की प्राथमिक शिक्षा के सेलेब्स की तरह लिखे शब्दों की प्रति मूर्ति बनाकर रख दिया है। वह केवल रबड़ स्टैम्प बना दिया है भारत के संविधान में घोषित कर के तथा रबड़ स्टैम्प के अनुसार ही कार्य करती नजर आती हैं। उनके अपने देश के हित के सुझाव शायद ही उन्होंने कभी दिये हो।
यह भारत के संविधान का सबसे अशोभनीय पक्ष है , गलत कानून पर हस्ताक्षर करना व करवाना राष्ट्रपति की वैधानिक मजबूरी, भारत के संविधान ने बना दिया है। बेचारे बन कर हस्ताक्षर कर दिए जाते हैं, राजनेताओं के हित के कानूनों पर साइन कर कानून बना दिया जाता है। मान लिया यह तो राजनीतिक दबाव के कानून की बदौलत वह बेबस है लेकिन महंगाई भत्ता देने से पहले महंगाई बढ़ा से तो रोक सकती हैं।
जनवरी के महीने से मिलने वाले महंगाई भत्ते की महंगाई नवंबर पिछले साल से लगातार,हर महीने में दो बार मार्केट में दामों में बगैर सिर पैर के बढ़ोतरी कर दी गई है। लेकिन महंगाई भत्ता अब तक देने का नाम तक नहीं लिया है शायद बीजेपी सरकार इसे देने के मूड में नहीं लग रही है। यदि देना होता तो मार्च के महीने में ही दे दिया होता।
तीन से चार प्रतिशत भत्ता देते हैं मंहगाई उसकी तुलना में 50 गुना बढ़ा दी जाती है। सरकार की महंगाई के इलावा बाजार इसे अपनी मर्ज़ी से बढ़ाते रहते हैं। राजनेताओं को वोट व रुपए चाहिए होते हैं इसके बदले में जनता को लूटने की पूरी छूट दे रखी है। कानून नाम की कोई व्यवस्था नहीं है। इन्फोर्समेंट पुलिस के अधिकारी व कर्मचारी देखें , लगभग तीस वर्ष हो गये है़। कोई अधिकारी कभी किसी दुकान वाले की जांच करते नजर नहीं आये है। पता भी नहीं है शायद यह डिपार्टमेंट ही समाप्त कर दिया होगा। ऊपर से कहते हैं हजार , पांच हो की मारवा है। पांच सौ रुपए अधिकारियों की औकात निश्चित कर दी है।
क्या सरकार के विषय सूची में महंगाई कम करना, या कम शब्द असंवैधानिक करार देकर शब्द कोष से ही हटवा दिया है। भगवान ने राष्ट्रपति को लकड़ी या प्लास्टिक का टुकड़ा न बनाकर हाड़-मांस का मनुष्य उन जमाखोरों के सामान बनाया है फिर क्यों नहीं वह अपने अधिकार का लूटेरों की भांति, शक्ति से प्रयोग करती हैं। ताकि उनमें कानून का डर रहे। राष्ट्रपति इस मुद्दे को गंभीरता से संसद में विचार व मंथन के लिए भेजे। ताकि राष्ट्रपति के पद की गरिमा बचाई जा सके।
