क्या कोई वस्तु या व्यवसाय, व्यवस्था आधार के बिना चल सकती है। इसका सीधा सा मतलब है नहीं। आधार के बिना कोई चीज टिक नहीं सकती है। पेंडुलम की तरह इधर उधर घूमती रहती है बिना उद्देश्य के। अर्थ व्यवस्था के विषय में भी लागू होता है। कोई भी अर्थ व्यवस्था बिना आधार के विकास की गति नहीं पकड़ती है। वह चरमरा कर ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है।
भारतीय अर्थ व्यवस्था के दो आधार स्तम्भ थे।अब दोनों ही गायब हो गए हैं। उसी तरह यह अर्थ व्यवस्था भी गायब हो जायेगी , जैसे पुरानी अर्थ व्यवस्था ढूंढे नहीं मिलती हैं। टक्का, दमड़ी,धेला, पाई इत्यादि। क्योंकि उनकी मूलभूत आधार की कोई कीमत नहीं बची थी महंगाई इतनी बढ़ गई थी कि लाखों पाई में कुछ नहीं आता था।
अब रुपए की बारी है, पैसा पहले ही गायब हो चुका है। जो अर्थ व्यवस्था का मूल स्तम्भ था। इसका जीता जागता उदाहरण है भूमि के रेट, जो भूमि पहले 5 पैसे में एक एकड़ आती थी अब उसके भाव प्रति एकड़ 485000000 रुपए है। रुपए की कीमत अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में शून्य होने वाली है। 1 रुपया भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल है लेकिन यदि आप एक रुपए का सामान खरीदने बाजार में देश के किसी भी हिस्से में चले जाना कुछ भी मिलेगा। आधार खत्म कर दिया है। यदि एक रुपए में एक किलो सोना मिलता तो भारतीय अर्थव्यवस्था को आधार मिल जाता। परन्तु 1 रुपए में तो 1 मिली ग्राम सोना नहीं मिलता है। कुछ समय बाद देश में मारा मारी की स्थिति होने वाली है। वस्तु एक और खरीददार एक करोड़।
इस स्थिति से निपटने के लिए नहीं अर्थ व्यवस्था लागू करनी होगी। रुपए की जगह मानव करेंसी लागू करनी पड़ेंगी। इसकी छोटी इकाई जीव करनी पड़ेगी। एक मानव = एक करोड़ जीव होगें। फिर अर्थव्यवस्था करोड़ों वर्षों तक सुदृढ़ बनी रहेगी। एक जीव में सारी दुनिया का सामान खरीदा जा सकता है।
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