हाल ही में उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश ने ऐसा फैसला सुना दिया है जिससे औरतों की दयनीय स्थिति होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। घीनोनें लोगों को इसी तरह के नासमझी युक्त निर्णयों का इन्तजार रहता है। उनकी मनमानी का खामयाजा समाज के गरीब तबकों के लोगों व लड़कियों तथा औरतों को उठाना पड़ता है।
एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के बाद गर्भ धारण करने के साथ मानसिक, शारीरिक व सामाजिक उत्पीड़न सहन करना पड़ता है।समाज में वह किसी लायक नहीं रहती है। अविवाहित लड़की के मामले में, यह स्थिति और भी गंभीर रूप धारण कर लेती है। उसका विवाह होना बहुत ही कठीन हो जाता है। यदि हो भी जाए तो, रिश्ता लम्बे समय तक नहीं पहुंच पाता है व तलाक का दामन थमा दिया जाता है।
उसका भविष्य काल गर्ल,व कोठे वाली की भांति ही नजर आ था है। समाज के ग़लत थपेड़ों की मार भोगनी पड़ती है। समाज उसे किसी भी रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं होता है। कोर्ट को गर्भपात को ऐसे मामलों में लड़की का अधिकार नहीं घोषित करना चाहिए था। इससे लोगों में बलात्कार करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा सत्य रुप में होगा। अपराधी को दण्ड न देने या देने , दोनों अवस्था में भविष्य लड़की का भविष्य चौपट होता है।
अपराधी दूसरी लड़की ढूंढने के फिराक में रहेगा। यह फैसला सुनाने से पहले,जज ने अपराधी को फांसी की सजा का सख्त प्रावधान क्यों नहीं रखा। ताकि मृत्यु के भय से बलात्कार की क्रिया कम की जा सके।यह फैसला तो बिल्कुल ग़लत कर दिया है। आये दिन बलात्कार व गर्भपात का नियम सा बन जायेगा। उच्चतम न्यायालय ने इस संदर्भ में पुनर्विचार विचार करना चाहिए ताकि लड़कियों व नारी समाज को सुरक्षित किया जा सके। सुरक्षित नारी ही एक सुरक्षित व सुदृढ समाज को प्रदान कर सकती है।
नारी व लड़कियों की सुरक्षा,हम सबका उत्तरदायित्व है। नहीं तो, आपके परिवार की नींव ही खोखली रखी जायेगी तो घर रुपी मकान ध्वस्त होते देर नहीं लगेगी।
