केन्द्र सरकार सरकार ने आजादी से लेकर ,आज तक सरकारी कर्मचारियों के साथ महाघोर अन्याय किया है। बिजेपी सरकार ने तो नंगा नाच धोखा-धड़ी का खेल तमाशा कर दिया है। छूठी खबरो का प्रोपगंडा इस समय की भारत सरकार से ज्यादा कोई नहीं फैलाता। हर जगह छूठ बढाचढ़ा कर बोली जा रही है सच्चाई का अंश मात्र भी देख ने को नहीं मिल रहा है।
सरकार ने किसी प्रकार की कोई बढोतरी किसी भी कर्मचारी के वेतन नहीं की है चाहे सातवां पै कमी शन हो पहला । हर पै कमीशन में कर्मचारी की पैमन्ट सरकार ने कम की है।जैसा नाम वैसा काम, कमी का अर्थ जब कम करना या होना होता है ते बढ़ोतरी का सवाल ही नहीं उठ सकता। पै कमीशन का मतलब होता है पै से कुछ हिस्सा कम कर दिया जाता है जिसे आम भाषा में सभी जानते हैं अपना काम निकलवाने के लिये दूसरे को देते हैं जब दूसरे को रूपये दे दिये तो पै बढ़ी कैसे।
मंहगाई भत्ता की बढ़ोतरी ,रिटेल मंहगाई का १०प्रतिशत भी नहीं दिया जाता है। आज के समय में सरकार ने जो मंहगाई भत्ता दिया है ,उसमें खाने लायक एक समय का खाना देकर सरकार दिखाये। पहले कांग्रेस सरकार ने व अब बिजेपी सरकार के महाघोर अन्याय का जीता जागता परिणाम अभी बताता हूं।
पांचवे पै कमीशन से पहले मंहगाई भत्ता स्लेब प्रणाली पर मिलता था। अधिकारी को कम तथा २,३,४ कलास कर्मचारी को ज्यादा मंहगाई भत्ता मिलता था । पिछले पै कमीशनों में स्लेब प्रणाली समाप्त कर । एट पार मंहगाई भत्ता दिया जाने लगा। जिससे देश नरक कुण्ड में गिर गया। हर अधिकारी को तृतीय व चतुर्थ तबके के कर्मचारी के कुल वेतन के बराबर से ज्यादा मंहगाई भत्ता हर छः महीने में मंहगाई भत्ते के रूप में प्रतिमास दिया जाने लगा। जिसने सरकार के काम काज में १०० प्रतिशत की गिरावट ला दी है। रूस की बाल सेविक क्रांति की तरह ,हर रोज की हड़ताल , भारत के संविधान में आग लगायेगी। काम कर्मचारी करता है पै अधिकारी को मिलती है। अधिकारी के बाहर काम चल सकता है लेकिन कर्मचारी के बिना एक सैंकण्ड भी का नहीं चल सकता है। कुछ ही वर्षों में सरकार के अधिकारी विआर स लेकर बाहर आ गये।सरकार हाथ मलती रह गई । आज वही छुट भईये अधिकारी नेता व मिल मालिक या विदेशों में भाग गये हैं।
ज्यादा तर अधिकारी तो शेयर मार्किट या कलोनी मार्किट के शिवाय कुछ करते भी नहीं है।किसी भी सरकारी अधिकारी का अपने कार्यालय में महीने में १० दिन ही काम करते नहीं पाओगे। सब दफतर से गायब मिलेगें। किससे लोग शिकायत करे।जब शिकायत करने की जगह शिकायत बन गई है।
जितना धोखा-धड़ी सरकार के अधिकारी ने देश के साथ की है इतनी किसी ने नहीं की है सरकार किसी विषय के प्रशिक्सन के लिये विदेश भेजती है तो वह अधिकारी वहां की योगिता भारत के खरज पर ,नौकरी छोड़ विदेश में नौकरी कर लग जाये है। सरकार मुंह लटकाये देखती रहती है।
अब , असली मुद्दे पर आयें। एक ही दफतर के एक अधिकारी व एक कर्मचारी एक ही दुकान से एक ही सामान लेते हैं क्या कोई बता सकता है कि दोनों एक साथ सामान लेते समय क्या भाव लगेगा, दोनों को दुकान दार की तरफ से यदि दुकान दार ,उन्हीं नहीं जानता है तो ,और यदि जानता है तो किस भाव सामान लगेगा।
पहले आशय में, दोनों को एक जैसा भाव दुकान दार दोनों से लगेगा, व लेना भी चाहिये। दूसरे आशय में, भाव अधिकारी को कम या बिलकुल भी नहीं घर तक पहुंचाने का खर्ज दुकान दार सहन करता है। व कर्मचारी को दुकान दार वाजिब गाम से बढ़ाकर सामान देता है।फिर क्या सरकार दुनिया को यह बता सकती है कि उस अधिकारी को मंहगाई भत्ता कर्मचारी के कुल वेतन से ज्यादा क्यों व किस बात के लिये दिया जाता है । क्योंकि मंहगाई भत्ता का सारा रूपया दुकान दारों के लिये ही दिया जाता है। जबकि ज्यादातर अधिकारी किसी भी दुकानदार को एक रूपया भी नहीं देते।मुफ्त में सामान डरा- धमकाकर एेंठ ले जाते हैं।
अब पहले के बिलकुल विपरीत सेल जो भारत सरकार का उपकर्म है में अधिकारियों को मंहगाई भत्ता अधिक दर से दिया गया जबकि कर्मचारियों को कम दर से मंहगाई भत्ता दिया गया है यह सरासर गलत है।व महाघोर अन्याय है। सरकार को चाहिये कि अधिकारी से पूछे कि उस की महीने की जरूत का आंकलन दे ,कितने रूपयों में वह सामान आयेगा।तथा वह धन राशि उस अधिकारी व कर्मचारी को दे दे।यदि सरकार काे यह मंहगा सौदा लगता है तो कर्मचारी को रहे कि महीने भर की जरूत का
आंकलन दे।उस राशि के बराबर राशि अधिकारियों को भी दे। मूल वेतन चाहे अलग रहे।
नहीं तो इस महाघोर अन्याय के दण्ड स्वरूप कोई सरकार नहीं बचेगी।