मोदी व खट्टर का स्वच्छ भारत

मोदी व खट्टर सरकार के करोड़ों रूपये खर्च कर भारत के गांव की क्या हालात कर दी है। इसकी ब्यान करती तस्वीर देखिये।

ऐसे वैसे नेता व मंत्री न बनाये

देश का इस से बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा जहां के मंत्री को यह पता नहीं कि राजनीति कहां करनी चाहिये। देश की अर्थ व्यवस्था के लिये सवाल राजनीति में नहीं उठायेगें तो कहां उठायेगें। राजनीतिक मंच पर देश की अर्थ व्यवस्था पर सवाल देश के वित्त मंत्री या अन्य मंत्री से सवाल करने पर , मंत्री कहता है कि राजनीति न करिये।तो मंत्री यह तो बताये कि वे करेगें क्या संसद में बैठकर ।

ऐसे नेता व मंत्री देश न बनाये जिसे यह भी पता नहीं कि संसद व राजनीति में होता क्या है तथा राजनीति का मतलब तक पता नहीं । राजनीति का मतलब लोगों में फूट डाल कर ,सिर फूड़वाकर संसद भवन में बैठकर आने को राजनीति नहीं कहते है। संसद भवन में बैठकर एक दूसरे पर लांछन लगाने का नाम संसद भवन नहीं है।।

संसद भवन का अर्थ है देश व समाज में फैली बुराईयों को जलाने के लिये सामूहिक एक मत से बुराईयों का सर्वनाश करने के लिये सूर्य के समान आग मय हो कर भस्म करना होता है।। सारे के सारे एम पी आग का गोला रहने चाहिये ,पांच बर्ष तक या तब तक एम पी रहते है। जो देश की बुराईयों को समाप्त न करने के लिये एम पी बनते है वे सड़ी मौत मरते है यह सब संसद सदस्य शुरू से देख रहे हैं। क्या -क्या बुरा हरस होता है।

अतः वही नेता बने जो देश के लिये करना चाहता है अपने लिये करने वाले का परिणाम अच्छा नहीं होता है। इसकी दुहाई नेता जनता को देता है। जनता नेता को ,जनता की दुहाई के कोप को नेता का शरीर सहन नहीं कर पाता है। तथा जान तक अन्याय के कारण दे बैठता है।

अभी तक भारत में शत प्रतिशत नेता लोग बेवकूफ है। वे यह नहीं जानते है कि जब चुनाव जीत जाता है तो वह उसको मिले वोटों की संख्या तक के लोगों का नेता नहीं है।जैसा कि भारत का हर नेता समझता है।चुनाव जीतने के बाद वह अपने ही नहीं दूसरे देशों की जनता का नेता भी होता है। सारे विश्व की जनता के साथ न्याय नहीं कर सकते है तो मृत्यु दण्ड सर्वभौम सत्ता द्वारा दिया जाता है जैसे कि सुस्मा शवराज व अरूण जेतली और अन्य के असमयिक निधन हुये।

किड़े- मकोड़ों तक के दण्ड संसद सदस्य को भोगने पड़ते है। अतः राजनेता सोच समझ कर बने, ऱूपये हडपने के लालच में राजनेता न बने।रूपयों के लालच में कुचिये की जाती में जन्म होता है।राजा रैयत का नाम तो हरियाणा का लोगों ने सुना होगा।।किसी राजनेता को पता नहीं हो तो पता कर लेना ,उनका काम धन्धा व जीवन शैली कैसी होती है।आजकल इस युग में क्या है।

कृष्ण भगवान १६००० रानियों को छोड़ अन्याय के कारण मौत की नींद सौ गये तथा उनके शरीर रूपी पत्थरों की कालिख सारी दुनिया देख रही है एक चोर और छलिये का क्या हसर होता है।राजा दशरथ तीन रानियों को छोड़ एक न के बराबर अपराध के दण्ड रूप मौत की नींद सो गया। रावण भी अपनी प्रजा की बद दुआऔ के कारण मौत की नींद सो गया। गिनती एक दो नहीं ,किताबो व ग्रंथो में जगह नहीं मिलती नाम लिखने को।

अतः इतिहास पढ़ कर समझ लेने में भलाई है झूठे वायदे न करे।

सरकार का अन्याय

खाद्य पदार्थों का वितरण सरकार द्वारा किया जा रहा है उसमें देशी गाय या भैंस का घी २ या १ रू किलो मजदूरों को दिया जाना चाहिये ताकि वे स्वस्थ रह कर ठीक ठाक काम कर सके। क्योंकि सेहत ठीक रखने के लिये शरीर में वसा की बहुत जरूरत होती है। ताकि थके बिना लम्बे समय तक काम कर सके।परन्तु कुछ डाक्टर लोगों के गलत व भारमक परचार के का कारण तथा बनियो व दुकानदारों के ठगी करने के इरादे से घी का खाने में इस्तेमाल करने पर घी पैदा करने वालों को रोक कर ,आप खरीद कर खाने लगे हैं। मरे-मरे से बनिये या दुकानदार आजकल मोटे ताजे दिखाई देते है।जबकि शारिरीक काम करने वाले दुकानदारों के निच किसम के बेटों जो डाक्टरी का पैशा करते हैं एक साजिस के तहत बन्ध करवा दिया।

अब मजदूर व आम आदमी बिमार व कमजोर हो गया है। उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे। एक घी व दूध की मना ही करवा कर ,खूद के लिये ढेर सारा घी व दूध ले गये।दूसरा बिमार होगें तो उनके बच्चे के अस्पताल चलेगें। तिसरा निशाना मुफ्त इलाज के चक्कर में जो रूपये पास में है वह भी सस्ती दवाई व बिमा के रूप ले लेगें । यदि आपने बिमारियों के इलाज के लिये बिमा करवा लिया तो बिमारियों पूरी उमर आप का पिछा नहीं छोड़ेगी। हस्पताल के बिस्तर पर ही दम निकलेगा।क्योकि कानून के लिखित रूप का अनुशरण व उपयोग तथा उपभोग अनिवार्य होते है।

गेहूं और चावल जैसे अन्न तो मजदूर अपनी कमाई से भी खरीद सकता है। दोनों को बन्द करके घी व बादाम व काजू ४ से पांच रूपये किलो देने चाहिये। ताकि दिमाग ठण्डा रख कर बिना हड़ताल व तोड़ फोड़ के काम कर सके, जो उनके निमित सरकार व प्रकृति ने दिया है । गैहूं और चावल का इतना ज्यादा उतपादन हो चुका है वह गोदामों में पड़ा सड़ रहा है।यदि पांच वर्षों तक एक भी दाना न उपजे गा तो भी काम चल जायेगा।अतः दालों व तेलों वाली फसलें बो कर अपनी खेती के धन्धे को सुचारू रूप से चला सकते हो।

सरकार के आंकड़े ९० प्रतिशत झूठे होते है।क्योंकि सरकार का अब मूल उद्देश्य गरीबी बढ़ाना है। गरीबों को रूपयें देने का मतलब है गरीबी का महाभंयकर रूप से आगाज करना।यदि सरकार ने गरीब को९ देना है व गरीब ने लेना है तो कर्म बन्धन के शिवाय कुछ न लो। आने वाले समय में रूपयों के बदले में कुछ नहीं आयेगा।यदि काम के बदले खाना पीना मिल गया तो ठीक , नहीं तो भूखे सोना पड़ सकता है।

नारंगी रंग का चाँद

आप को सफेद चांद तो हमेंशा दिखाई देता है।नीला चांद किसी ग्रहण काल में दि खाई देता है। संतरे रंग का चांद पूर्णिमा वाले दिन व व निकलता चांद दिखाई देता है। ।

शिखर में नारंगी रंग का चांद कभी नहीं देखा होगा। यह देखिये।

प्रैस की आजादी कहां है।

न्याय पूरक प्रैस रिपोरटर की हत्या करवा दी जाती है तो आजादी कहां है।सरकार बताये कितनी आजादी प्रैस को दी है। वे प्रैस रिपोरटर को तब तक कुछ नहीं जब तक उनके फायदे व पब्लिसिटी में सहायक होता है। अन्यथा हत्या करवा ने में लोगों को थोड़ा सा भी गुरेज नहीं है। चोर डकैत पब्लिसिटी करने पर हत्या करवा देते है या कर देते है।

सैनिक तो दुशमन की शत्रुता का शिकार होते है जब कि प्रैस रिपोरटर का हर कोई दुशमन बन जाता है जब वह निशपक्स रिपोरट देता है।

किसान खर्च व हमियत

किसान कर्ज के बोझ को कम करने व अपनी हमियत बढ़ाने का स्वयं कारगर यह उपाय कर सकता है। जिससे वह अपनी जिन्दगी स्वस्थ तथा बगैर मानशिक तनाव के जी सकता है।

जब तक किसान केवल अपनी जरूरत के ज्यादा फसल पैदा करेगा तब तक किसान की तथा उस की फसलों की बेइज्जती होती रहेगी। जिस दिन किसान ने अपने खाने तक की पैदावार पैदा करनी शुरू कर दी ।उसी दिन से किसान के वारे न्यारे हो जायेगे।मजदूर मुफ्त में काम करने को तैयार हो जायगा।जो आजकल गाड़ी कार में बैठकर और इतने मंहगे भाव कि मजदूरी मांगताहै।सरकार व आढ़ती बेइज्जती करते रहते है़ं आनाज को मण्डियों सूअर खा जाते है।फसल खरीदने से मना कर देते हैं।

इन सब बातों से छूटकारा पाने तथा धरने बंध करने से अच्छा है अपनी आवश्यकता से ज्यादा एक दाना भी न बिजाई करो। पानी ,सपरों ,बुहाई ,कटाई, पर सारा खर्च होता है।कम बिजाई करो ताकि फालतू की दुनिया के बेमतलब के घिसे पिटे नौकर न बनो।जब घर खर्च के लिये एक दो एकड़ तक की खेती करोगे व बाकि खेतखाली छोड़ दोगे तो सरकार व व्यपारी बिना बुलाये किसान के पैरों पर सिर रख कर गिड़गिड़ायेगें।

सरकार से मुफ्त में लेना छोड़ दो , सरकार अगले ही दिन सीधी हो जायेगी बशर्त कि किसान के अपने खाने पिने के लिये ही पैदा करे। और अपने कर्च स्वयं कम करे।किसी और के लिये खाना पैदा करने के लिये तुम मत कर्ज दार बनो। बनिया व सरकार वाताअनुकुलित में बैठकर कर ,किसान की छः महीने की कमाई का मण्डी उपहास उड़ाता है। किसी दुकान पर सामान लेते वो कोई रेट कम नहीं करता , उपर से अनाप शनाप बकते है।

तो किसान भी उन्हीं की तरज पर कम पैदावार करके अपनी मर्जी के तथा तुम्हारे दरवाजे हाथ जोड़कर मर्जी के भाव देगें। ये भूल जाओ कि दूसरे देशों से आनाज मंगालेगें। बाहर भी न फालतू आनाज पैदा करते है न सस्ता है। बाहर से आनाज मंगाने के लिये बिजाई से पहले आर्डर देने पड़ते है। यदि ठीक ठाक पैदा हो गया तो ही मिलेगा। यदि प्राकिरतिक आपदा की भैंट चड़ गया तो भूखे मरो।

अपनी हमियत कम न होने दो। तथा किसी प्रकार का पूजा पाठ न करो तो आपको किसी प्रकार की हानि नहीं होगी। हानि हमेशा पूजा पाठ करने से ही होती है।पूजा के फल स्वरूप देवी देवता पता नहीं किस २ बुरे लोगों के भाग का हिस्सा वचनों पर आधारित बन्ध जाते है और उमर दर उमर दण्ड भोगने पड़ते है।जिसके तुम अधिकारी ही नहीं थे। ऐसा कोई भगवान व देवता किसी भी जगत में नहीं हैं जिसको दिये वचनों की एवज में कुछ भी न देना पड़ता हो।

अपने करमों व भाग की दासता तो स्वीकार की जा सकती है। दूसरे का तो हानि के बराबर का लाभ हर जगत में देना पड़ता है।अतः सरकार व व्यपारी से पूरी भरपाई के वादे के बिना उनके हिस्सों की पैदावार की बिजाई न करो । इस बात को छोड़ देना कि मैं नहीं तो कोई और बो कर फैदा ले लेगा।यह अन्याय सातविक शक्तिया कभी सहन नहीं करता है।

यह सब छुठ है कि इतना धुंआ पराली से हुआ था।यदि था तो आज कहां गया। रात को धुंआ खत्म नहीं हो सकता विग्यान की माने तो।क्योंकि रात की ठँड धुंये को ऊपर जाने नहीं देता जबकि कल रात को धुंआ समाप्त हो गया था।

केन्द्र सरकार की धोखा-धड़ी

केन्द्र सरकार सरकार ने आजादी से लेकर ,आज तक सरकारी कर्मचारियों के साथ महाघोर अन्याय किया है। बिजेपी सरकार ने तो नंगा नाच धोखा-धड़ी का खेल तमाशा कर दिया है। छूठी खबरो का प्रोपगंडा इस समय की भारत सरकार से ज्यादा कोई नहीं फैलाता। हर जगह छूठ बढाचढ़ा कर बोली जा रही है सच्चाई का अंश मात्र भी देख ने को नहीं मिल रहा है।

सरकार ने किसी प्रकार की कोई बढोतरी किसी भी कर्मचारी के वेतन नहीं की है चाहे सातवां पै कमी शन हो पहला । हर पै कमीशन में कर्मचारी की पैमन्ट सरकार ने कम की है।जैसा नाम वैसा काम, कमी का अर्थ जब कम करना या होना होता है ते बढ़ोतरी का सवाल ही नहीं उठ सकता। पै कमीशन का मतलब होता है पै से कुछ हिस्सा कम कर दिया जाता है जिसे आम भाषा में सभी जानते हैं अपना काम निकलवाने के लिये दूसरे को देते हैं जब दूसरे को रूपये दे दिये तो पै बढ़ी कैसे।

मंहगाई भत्ता की बढ़ोतरी ,रिटेल मंहगाई का १०प्रतिशत भी नहीं दिया जाता है। आज के समय में सरकार ने जो मंहगाई भत्ता दिया है ,उसमें खाने लायक एक समय का खाना देकर सरकार दिखाये। पहले कांग्रेस सरकार ने व अब बिजेपी सरकार के महाघोर अन्याय का जीता जागता परिणाम अभी बताता हूं।

पांचवे पै कमीशन से पहले मंहगाई भत्ता स्लेब प्रणाली पर मिलता था। अधिकारी को कम तथा २,३,४ कलास कर्मचारी को ज्यादा मंहगाई भत्ता मिलता था । पिछले पै कमीशनों में स्लेब प्रणाली समाप्त कर । एट पार मंहगाई भत्ता दिया जाने लगा। जिससे देश नरक कुण्ड में गिर गया। हर अधिकारी को तृतीय व चतुर्थ तबके के कर्मचारी के कुल वेतन के बराबर से ज्यादा मंहगाई भत्ता हर छः महीने में मंहगाई भत्ते के रूप में प्रतिमास दिया जाने लगा। जिसने सरकार के काम काज में १०० प्रतिशत की गिरावट ला दी है। रूस की बाल सेविक क्रांति की तरह ,हर रोज की हड़ताल , भारत के संविधान में आग लगायेगी। काम कर्मचारी करता है पै अधिकारी को मिलती है। अधिकारी के बाहर काम चल सकता है लेकिन कर्मचारी के बिना एक सैंकण्ड भी का नहीं चल सकता है। कुछ ही वर्षों में सरकार के अधिकारी विआर स लेकर बाहर आ गये।सरकार हाथ मलती रह गई । आज वही छुट भईये अधिकारी नेता व मिल मालिक या विदेशों में भाग गये हैं।

ज्यादा तर अधिकारी तो शेयर मार्किट या कलोनी मार्किट के शिवाय कुछ करते भी नहीं है।किसी भी सरकारी अधिकारी का अपने कार्यालय में महीने में १० दिन ही काम करते नहीं पाओगे। सब दफतर से गायब मिलेगें। किससे लोग शिकायत करे।जब शिकायत करने की जगह शिकायत बन गई है।

जितना धोखा-धड़ी सरकार के अधिकारी ने देश के साथ की है इतनी किसी ने नहीं की है सरकार किसी विषय के प्रशिक्सन के लिये विदेश भेजती है तो वह अधिकारी वहां की योगिता भारत के खरज पर ,नौकरी छोड़ विदेश में नौकरी कर लग जाये है। सरकार मुंह लटकाये देखती रहती है।

अब , असली मुद्दे पर आयें। एक ही दफतर के एक अधिकारी व एक कर्मचारी एक ही दुकान से एक ही सामान लेते हैं क्या कोई बता सकता है कि दोनों एक साथ सामान लेते समय क्या भाव लगेगा, दोनों को दुकान दार की तरफ से यदि दुकान दार ,उन्हीं नहीं जानता है तो ,और यदि जानता है तो किस भाव सामान लगेगा।

पहले आशय में, दोनों को एक जैसा भाव दुकान दार दोनों से लगेगा, व लेना भी चाहिये। दूसरे आशय में, भाव अधिकारी को कम या बिलकुल भी नहीं घर तक पहुंचाने का खर्ज दुकान दार सहन करता है। व कर्मचारी को दुकान दार वाजिब गाम से बढ़ाकर सामान देता है।फिर क्या सरकार दुनिया को यह बता सकती है कि उस अधिकारी को मंहगाई भत्ता कर्मचारी के कुल वेतन से ज्यादा क्यों व किस बात के लिये दिया जाता है । क्योंकि मंहगाई भत्ता का सारा रूपया दुकान दारों के लिये ही दिया जाता है। जबकि ज्यादातर अधिकारी किसी भी दुकानदार को एक रूपया भी नहीं देते।मुफ्त में सामान डरा- धमकाकर एेंठ ले जाते हैं।

अब पहले के बिलकुल विपरीत सेल जो भारत सरकार का उपकर्म है में अधिकारियों को मंहगाई भत्ता अधिक दर से दिया गया जबकि कर्मचारियों को कम दर से मंहगाई भत्ता दिया गया है यह सरासर गलत है।व महाघोर अन्याय है। सरकार को चाहिये कि अधिकारी से पूछे कि उस की महीने की जरूत का आंकलन दे ,कितने रूपयों में वह सामान आयेगा।तथा वह धन राशि उस अधिकारी व कर्मचारी को दे दे।यदि सरकार काे यह मंहगा सौदा लगता है तो कर्मचारी को रहे कि महीने भर की जरूत का

आंकलन दे।उस राशि के बराबर राशि अधिकारियों को भी दे। मूल वेतन चाहे अलग रहे।

नहीं तो इस महाघोर अन्याय के दण्ड स्वरूप कोई सरकार नहीं बचेगी।

दिल्ली छोड़ ने वाले

देश वासियों को दिल्ली छोड़ ने वालों को कहीं पर तथा किसी भी किमत पर जमीन नहीं देनी चाहिये।लोग रूपयों के लालच में अपनी जमीन खानाबदोश लोगों को दे देते हैं तथा खाना बदोश दो चार साल उस जगह पर रहेगें , गन्दगी फैला कर दूसरे स्थान पर गन्दगी फैला ने चल देते हैं।

भारत में खानाबदोशों की संख्या बहुत ही ज्यादा। हर कोई ,हर रोज एक नया व गन्दगी का ढेर ( शहर) बसाने चल पड़ता है। कुछ ही समय में वह जगह कुड़े करकट का ढेर बना कर, दूसरी जगह के लोगों को बेवकूफ बनाने चल पड़ते हैं। तथा जिसने भी उनको जमीन दी वे भूखे व सड़ रहे हैं।

इसमें राजनेता, व्यपारी , सरकारी अधिकारी , कर्मचारी व मजदूर लोगों का सबसे बड़ा योगदान है। हर राजनेता , सरकारी कर्मचारी व्यपारी हर शहर में अपनें घर रखने की फिराक में रहता है। किराये की फिराक में मजदूरों को बरगलाकर शहर के कूड़ादान में ले जाकर फैंक देता है। किसी भी राजनेता , व्यपारी व मजदूर के गांव देख लो। कितनी गन्दगी फैला कर ,तीनों ही दूसरी जगह पर गन्द फैलाने चले गये है।गन्दगी फैलाने की होड़ में सरकार व व्यपारी हर रोज नई नई कलोनी व सैकटर काटते फिरते है । आज तक का रिकार्ड है लोग सरकार की तहसील में जाकर ,जैक कर सकते हैकि इन लोगों ने खेती वाली जगह छोड़ कर कहीं भी शहर व गाम बसाये हो।

आने वाले कुछ दिनों में खेती वाली जमीन तो जापान की तरह बचेगी नहीं,क्योंकि उनमें भी शहर बसाने का बहुत बड़ा हुनर है। आजकल वहां पर खेती गमलों में व घर की छत पर ही होती है बाकि जमीन शहर व शहर की गन्दगी ने खा ली।बस कुछ ही वर्षों का इन्तजार कर देखते रहो, तुम्हारी हालात जापान से कम बदतर होने वाली नहीं

हैं ।

पराली का धुंआ

पराली के धुंये से खतरनाक धान की खेती है जो धान की रूपाई से लेकर कटने तक शरीर के हिस्सों को गलाने के रोग देती है। अब क्यों न धान की पैदा वार पर रोक लगा देनी चाहिये। कुछ हजार रूपयों के लालच को छोड़ कर कम पैदावार वाली तथा साफ सुथरी जगह पर पैदा होती हो। ताकि स्वस्थ कह सके।

धान तो सड़ी जगह में पैदा ह़ोता है। साफ जगह पहले सड़ाना पड़ता ,धान उगाने के लिये। तो सड़ ने का चुनाव क्यों करते हो। यदि करते हो तो फिर आपको सड़ ने से कोई नहीं रोक सकता। आजकल अधिकतर किसान सड़ कर मर रहे हैं या सड़ रहे हैं। बिमारी के कारण प्रत्यक्श अप्रत्यक्श हो सकता है। लेकिन चिन्ता का विषय है।

धुंआ फैला हुआ तो बहुत ,दृष्टि बाध्यता भी बहुत पर ,सांस से ने में कोई परेशानी नहीं है। वैसे यह ज्यादा बादलें की वजह से है। देखते अगले चुनाव आने पहले सरकारी तंत्र कैसे कानून बनाता है।

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें