पुष्कर ब्रम्ह सरोवर वहां है ही नहीं

आपको जानकर दुःख होगा कि राजस्थान में एक जगह है पुष्कर उसका नाम पुराणों में पढ़ा व लोगों से सुना भी बहुत था। सौभाग्य से वहां पर जाने का मौका मिल गया। वहां पहुंचाने में तो कोई तकलीफ नहीं हुई। लेकिन वहां पहुंचकर ,देखने पर बहुत दुःख हुआ कि लोग कितने छुठे हो सकते है।वहां पर अधिकतर लोग छुठ बहुत बोलते है व गलत जगह बताते हैं। बाहर से आने वालों कितना ठगते होगें ,इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगा सकते हो।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पुष्कर में कोई ब्रम्हा का सरोवर है ही नहीं। वहां पर एक झील है। वहां पर लिखा भी है लेक व्यू। गंदगी इतनी कि कहीं पर भी नहीं होगी। वहां के कुछ लूटेरे जिन्हें लोग पंडित व पंडा कहते हैं स्वयं जूतों में घूमते हैं औरों को जूते निकालने व गन्दे व सड़े पानी में नहाने की कहते हैं।वहां पानी इतना गंदा है नहाने से चर्म रोग हो सकते हैं सारे पानी का रंग हरा है। जिसमें फफूदीं बहुतायत में होती है व चर्म रोगों का अहम कारण होती है।

सबसे बड़ा तथ्य यह है कि ब्रम्ह सरोवर का परिमाण आयताकार व योजन में होता है। वह न आयताकार है न ही, वर्गाकार है योजन तो दूर की बात है कई पुष्कर जैसे शहर समाहित हो जायेगें एक ही योजन में। वहां पर तो कट्टा फट्टा ,तिरछा, गोल सब आकृति के अंश बने पड़ते हैं। जो शारिरीक कष्टों का कारण बनते हैं।जैसे वह टूटा फूटा है वैसे ही मनुष्य के शरीर में भी विकार आने शुरू हो जाते हैं। वहां स्नान करना तो दूर ,ऐसा जगह के दर्शन नहीं करने चाहिये।

ब्रम्हा कभी छुठा नहीं होता है , न छूठ से उनका कोई सरोकार होता है। लेकिन वहां पर बोलते ही नहीं ,बिकती भी है वहां छुठ बोलकर लोग क्या -क्या बेच जाते हैं। सबसे बड़ी बात और वहां पर ब्रम्हा का मन्दिर सोने की मूर्ति के ब्रम्हा विराजमान है। वहां पर तो पितल के ब्रम्हा भी नहीं हैं। जो मूर्ति हनुमान के मन्दिर में रखी है, वह पता नहीं किस की है कोई देव तो लगता नहीं। कार्तिक माह की चतुर्दशी शुक्ल पक्श की, कहते हैं ब्रम्हा पूरे माह वहां रहते है़ं। मैंनें बहुत ढूढ़ा वहां पर नहीं मिला। क्या आपको पता है वहां ब्रम्हा क्यों नहीं रहते हैं।

आपने विष्णु व शिव जी का नाम तो सुना होगा। वे भी ब्रम्हा की तरह हैं तो बड़े देव। परन्तु पुष्कर में शिवजी के शिव लिंग व कृष्ण राधा के मन्दिर बने हुये है। ये तीनों देव कभी भी साथ नहीं रहते हैं ना रह सकते हैं। यदि साथ में या एक स्थान पर ,इन के स्थल बना दिये तो ये अपनी आपसी लड़ाई व बड़े की होड़ में ,दुनिया में लड़ाई झगड़े करवाते रहते हैं । यह सब अग्यानी ब्राहमणों के कारण होता है । जिन्होंने अधिक कमाई करने के चक्कर में ,दुनिया को आपसी लड़ाई में बदल दिया।

आप इस बात को अजमा सकते हो। जहां पर अलग अलग देवों के मन्दिर एक शहर या गांव में होगें ,वहां पर बहुत लड़ाई झगड़े का इतिहास मिलेगा। दूसरी तरफ जिस जगह पर कोई देव मन्दिर,गरूद्वारा ,मसजिद,व गिरजाघर नहीं होगें , वहां पर लड़ाई का इतिहास नहीं मिलेगा।आप किसी झगड़े वाली जगह के सारे मन्दिर ,चाहे किसी भी धर्म के हो तुड़वा दो,फिर देखो वहां पर किसी भी प्रकार व किसी भी जन्म में लड़ाई झगड़े देखने को मिल भी जाये तो। यदि आप पुष्कर ब्रम्हा को देखने या किसी कारण जाते है तो मत जाना , वहां पर तो शिव व पैगेम्बर मौहम्मद मिलेंगे। वे वहां पर थे हरे रंग के मन्दिर में।

पाकिस्तान में दूध

पाकिस्तान में गाय और भैंसे तो होती नहीं है वहां पर भेड़ व बकरियों का दूध निकालते हैं। भैड़ व बकरियों को वहां के लोग मार कर खा जाते हैं।इसलिये उनकी संख्या बहुत कम संख्या में दूध निकाला जाता है। तो दूध के दाम तो ज्यादा होगें ही। वहां का रूपया भी कमजोर होगा। वहां के लोगों के हिसाब से बिलकुल ठीक ठा

क है।यदि कोई वस्तु कम होगी तो किम्मते तो ज्यादा होगी ।

पाकिस्तान की जनता को दूध के दाम कम करने के लिये शाकाहारी बनना पड़ेगा।बकरियों व भैड़ों की हत्या रोकनी पड़ेगी।

जाती टोने के आंकड़े से

जादू टोनों के आंकड़ों से सरकार नहीं बनती है।सरकार ,लोगों के द्वारा दिये विश्वास से बनती है। महा राष्ट्र के लोगों ने टूटा फूटा मत व्यक्त किया है। ऐसे मत अभिव्यक्ति से सरकार कभी नहीं बनती है। मिली जुली सरकार किसी का भला नहीं कर सकती। क्योंकि इसमें उतरदायित्व कोई पार्टी नहीं लेती है।

संविधान के विशेषग्य

पता नहीं भारत में ही ऐसा क्यों होता है।जब पूरे घटना क्रम को पूरा समय दिया गया लेकिन सरकार बनाने में नाकाबिल हुये तो कह दिया कि राज्यपाल का फैसला गलत।क्या ये संविधान विशेषग्य दुनिया को बता सकते है कि जो मनुष्य पांच वर्षों में किसी भी राज्य के लोगों का आधा विश्वास अपने लिये नहीं जुटा पाये तो उन्हें सरकार बनाने का संविधान के अन्तर्गत कोई अधिकार नहीं होता है कि वे किसी भी किमत पर सरकार बनाये। केवल राष्ट्रपति शासन तो चुनाव परिणाम के बाद ही लगा देना चाहिये था फिर भी चाहे गलत मानदण्ड अपनाये हो लोगों को सरकार बनाने का पूरा समय दिया गया।

अब पांच वर्षों तक राष्ट्रपति शासन महाराष्ट्र में रहे ताकि लोगों को बेमतलब का खर्च न सहना पड़े।तथा भगोड़े नेताओं को जनता इसी प्रकार दण्डित करती रहे।राष्ट्रपति शासन में निशपक्स तरीके से राज्य का विकास हो सकता है। नेताओं की दखलन दाजी समाप्त हो जाती है व सरकारी अधिकारी सही तरीके से विकास करवा सकते है। नेता लोग अपने व्यक्तिगत कारणों से पार्टी तोड़ते नहीं फिरेगें। विकास कार्य कार्य करवाते अधिकारी ही है सब कुछ उन्हीं को तो करना होता है नेता हो या न हो। वे तो बिचोलिये बन कर विकास राशी का गबन कर जाते हैं।

राज्यपाल का उत्तम निर्णय है राष्ट्रपति शासन महाराष्ट्र में लगा देना।

प्याज की किमत

प्याज की की किमत बढती नहीं है बढ़ाई जाती है।जबकि प्याज का पोष्टिक खाने की संग्यान में कोई महत्व नहीं।इसके कारण मुंह से दुर्गंध आता है रेट की बिमारी जिसे वायु रोग कहते हैं यह आपको समाज में हेय नजर से देखने पर मजबूर करता है। लोग नाक व भौह चढ़ाते है। फिर क्यों खाते है लोग इसे। सब्जियां तो प्याज के बैगर हमेशा अच्छी व स्वादिष्ट बनती है।

किमते बढ़ाने का मुख्य कारण चुनाव में दिये गये चन्दें की भरपाई के कारण खुली लूट की छूट देती है।जब तक आयातित प्याज आयेगा तब तक तो लूट ने वाले , लोगों को लूट लेगें। प्याज चाहे तो आयात कर ले। वे भी सस्ते दामों पर आयात कर ,मंहगे पर बेचेगेें। वो भी तो आयात करेगें। सरकार चाहे आयात कर लेंगें। दोहरी लूट करेगें।ये सब बड़े शोपिंग माल वालों का किया धरा है। आप सस्ते में खरीद कर, मंहगे भाव पर बेचते हैं।यदि ये लोग अण्डरग्राऊंड भी न करे तो भी उनके माल में किम्मते पचास से सौ गुणा ज्यादा होती है। वहां पर एक प्याज व एक आलू एक हजार रूपये का बिकता है हर रोज। चाहे बाहर भाव कुछ भी क्यों न हो।प्याज व लहसून खाने में नगण्य वस्तुयें ,उनको किसी प्रकार का महत्व नहीं दोगे तो किमते अपने आप गिर जायेगी। जैसे बादाम अन्य प्रकार के मेवें है कोई नहीं खरीदता है ,पहले गरीब से भी गरीब व्यक्ति इनका प्रयोग करता था। लोग गलियों में रूके मारते फिरते है । अतः प्याज का हालात भी काजू व बादाम की तरह करदो। व्यपारी सब्जियों के साथ मुफ्त में देने को मजबूर हो जायेगे। क्योंकि सिजन निकलते ही पहले सामान की किमत कुछ भी नहीं रहती है। केवल किड़ों का ग्रास बन जाता है।

ग्रहणी यदि प्याज को अहमियत देती है तो उसको पाक शाला का सही ग्यान नहीं है। दूसरा प्याज जैसी बैकार की फसलों की किमत बढती कर व्यपारी किसानों की खेती वाली भूमी निलामी करवाते फिरते है।हर रोज जगह-जगह खरपतवार की तरह कटने वाली कलोनियां , प्याज जैसी अवांछित वस्तुओं से मोटा मूनाफा कमा कर ,लोग रियल स्टेट के व्यपारी बनते हैं। जहां किसान नंगा होकर निलाम होता है। उसे लोग दर -दर का भिखारी बना कर चलते बनते है।

खेती लायक जमीन बनाने में कई जन्म बीत गये , किसानों के, लेकिन कुछ ही सैकंड में जन्मों की मेहनत का जनाजा निकाल कर ,उसे भिखारी बना धक्के खाने को मजबूर देते हैं।जगह -जगह ईंट, टोरड़े व पत्थर बोे दिये। इसमें सबसे गन्दा हाथ है मन्दिर ,मसजिद गुरूद्वारा गिरजाघर बनाने में। उनके आस पास की भूमी पर लोग बेमतलब ही बसने लगते हैं कुछ दिनों बाद गुट बाजी बन जाती है फल स्वरूप दूसरा भगवान और पैदा कर लेते हैं। और जन्म -जन्मान्तर की दुशमन के अड्डे बना कर मर जाते है। हकीकत में भगवान नाम की कोई वस्तु होती नहीं।

सब तुम्हारे मरे पूर्वजों के भूत हैं।

लोग पागल व झगड़े पर

लोग पागल व झगड़े पर उतारू क्यों होते है इसकी कारण ज्यादातर ही नहीं बहुदा बार किसी दुरात्मा के स्पर्श का खाना खाने से होता है। यह कर्म ज्यादातर सेवड़े बाबा या तांन्त्रिक लोगों के टोटकों के कारण होता है। तथा सारी उम्र दँड भोगने के शिवाय कुछ चारा लोगों नहीं चलता है। वह उनके चक्करों में इस कदर फंस जाता व जाती है। केवल व केवल नरक के शिवाय कुछ नसीब नहीं होता है।

यदि इस नर्क से निकलना है तो केवल स्वयं के इलावा किसी की भी मदद दु ख दायी होगी। पता नहीं कितनी दुनिया के बुरे कर्मों से गुजरना पड़ेगा। परन्तु इसके अलग कोई चारा नहीं है। यदि आप किसी भगवान के सारे ये दुःख काटने के चक्कर में है तो वहां पर भी यही यातनायें भोगनी पड़ती है। जिस भगवान की पूजा करोगे ,उसके पितरों की भांति पिंड दान तक करने पड़ते है।अतः बाबे आदि राक्स्सों के लिये करने से अच्छा है अपने सगे सम्बन्धियों के पिंड दान से ये लडा़ई -झगड़े व पागलपन बन्द हो सकता है।

सर्त तो नहीं लेकिन पिंड दान करने के हर धर्म व महजब के स्थान निर्धारित होते है अतःवही पर पिंड दान करना चाहिये। वहां पर बने जल सरोवर में स्नान नहीं करना चाहिये।वह स्थान केवल ब्रम्हा के स्नान के लिये होता है।यदि आपने पिंड दान से पहले या बाद में सरोवर के जलमें स्नान कर लिया तो आपको कष्ट कम होने की बजाय बढ़ जाते है।लोग कहते फिरते है पिंड दान करने पर भी कष्ट कम नहीं हुये । अतः कोई घूमने ,देख ने किसी भी पिंड दान स्थल स्नान न करे।जाहे बामण कहता रहे। क्योंकि बामण ज्यादातर तो अनभिग होते हैं कुछ तांत्रिक किसम के बामण लोगों के बाबों की तरह फसाते व जलते बनते हैं।

औरतों को तो किसी भी किमत पर वहां पर नहाना नहीं चाहिये। लोगों को सचेत करने का आखरी लेख ।

सस्ते व मंहगा

समय के बाजार में सब कुछ सस्ता है।समय किसी भी वस्तु व आदमी का भाव तब गिरा दे ,पता नहीं चलता।अतः समय को महत्व देना चाहिये।

सेहत व आमदनी

आजकल आम आदमी का मंहगाई के कारण व बेरोजगारी के कारण जीना बहुत ही कठीन कार्य हो गया है।आदमी काम धंधे की तलाश में मारा मारा फिरता है।कोई काम नहीं मिलता है इसके लिये वह चिन्ता में अपनी सेहत भी गंवा देता है उसे खांस व चिन्ता के कारण तपेदिक जैसे जानलेवा रोग भी गले पड़ जाते हैं।मैं आप को एक ऐसा काम बताऊंगा ,जिसमें आप का एक पैसा भी नहीं लगेगा ,सेहत भी ठीक ठाक रहेगी।आपकी कुछ हद तक की चिन्ता भी दूर हो जायेगी।

बैगर किसी प्रकार की खेती के , आपको सौ, दो सो रूपये बिना किसी रूपये व पैसे के नियोजन के बिना कमी सकते हो।आपकी जेब से केवल खर्च होगा तो केवल घूमना फिरना होगा।नकिसी को किसी प्रकार का प्रतिशत भी नुकसान नहीं होगा।आपको केवल थोड़ा बोझ उठाना पड़ेगा, जिसका वजन केवल पांच दस ग्रांट से लेकर दो चार किलो या आपके सामर्थ्य के अनुसार कर सकते हो।।

रेतली जमीन व बैरानी जमीन पर एक खरपतवार की तरह की एक झाड़ी होती है जिसे अंग्रेजी में स्रब भी कहते हैं। बहुत ज्यादा मात्रा में होती है।लोग इसको जड़ समेत निकाल कर ,खेत की बाड़ करने के शिवाय कुछ और काम नहीं लेते हैं।क्योकि इस में कांटे बहुत मात्रा में होते हैं।अतः इसे बैकार की वस्तु समझ जला देते हैं ताकि खेत साफ व खेती लायक हो सके। यह फसलें नहीं होने देताी है। काम करते वक्त हाथ व पैरों में कांटे चुभ जाते हैं।इसे चाहते एक प्रतिशत लोग भी नहीं,परन्तु बिना चाहे भी ,होती बहुत ही ज्यादा है।

इस झाड़ी की बहुत सारी खासियत हैं। जिनके लाभ लोग ,एक पैसा खर्च किये बैगर ले सकते हैं। यह बालू मिट्टी वाली जमीन में जतना काटोगे उतना ही ज्यादा होगी।यदि इसकी एक भी नर्व जड़ रह जाती है तो यह पुनः पैदा हो जाती है। पानी की एक बूंद भी नहीं चाहिये ,पैदा होने के लिये।यदि इसकी खेती की जाये तो यह एक एेसी पैदावार है जिस पर किसी को एक पैसा भी जेब से खर्च करना नहीं पड़ेगा।इस पर जो फल लगता है ,वह बहुत काम की चीज है।

यह रोग ठीक भी कर सकता है और पैदा भी कर सकता है। इसके फल को बेर कहते हैं लेकिन यह बेर बागवानी वाली बेरी के बेर से बहुत छोटा होता है आकार में। इस बेर में पल्प न के बराबर ही होती है बाद के ऊपर छिलका व पतली सी पल्प होती है। यह खाने में स्वादिस्टता के साथ रोग नाशक भी है।इससे गले के अन्दर होने वाली खरास,गले में चिपचिपापन को खत्म करती है।गले साफ करती हैं यदि बेर हरे रंग के न हो तो।हरे रंग के बेरों से खांसी हो जाती है। इस में विटामिन सी प्रचूर मात्रा में होता है।इसलिये यह शरीर की रोग प्रतिरोधक अक्शमता बढ़ाता है। यह पूर्णरूप से प्रकृति द्वारा पोषित है।किसी प्रकार की किटनाशक का कोई प्रयोग इस नहीं होता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा किसान को यह होता है कि बिना एक पैसा खर्च किये ,खेत की बाड़ की जाती है जो किसान के हजारों रूपये बचाती है।लोहे के तारों की बाड़ का सारा रूपया बच जाता है। किसान खुद की नासमझी के कारण इस अनमोल रतन के लाभ से वंचित है।खेत के चारो ओर हैज के रूप में लगा कर बाड़ करने से खेत की सुन्दरता के साथ बैरों की की फसल भी ले सकते है। इसके लिये पानी की तो जरूरत कतई नहीं। केवल छंटाई के लिये बागवानी वाली कैंची चाहिये ,जो बाड़ की कटाई व छंटाई कर सुन्दर बना सके । जैसे बोगन वेलिया की छंटाई की जाती है।

इसके इलावा इसकी लकड़ी इन्धन के रूप में प्रयोग की जा सकती है ।घर व खेत में धुंआ करने के लिये प्रयोग कर सकते है जो फसलों को किटों के प्रकार से बचाता है।हर रोज सैर करने के बहाने भी घूमने जाते व आते समय सौ, दो रूपये के बेर मुफ्त में लगा कर बेच सकते हो।उनके बाजार में पचास सेअस्सी रूपये किलो बिकते है।नहीं तो अपने रोग ठीक करने के लिये प्रयोग कर सकते हो।

बैंक में रूपयों को कोई डर

यदि सरकारी बैंक सुरक्शित नहीं है तो प्राईवेट का तो किसी भी प्रकार व एक प्रतिशत भी विश्वास किसी भी किम्मत पर विश्वास नहीं करना चाहिये। सारी सुरक्सा तो सरकार द्वारा वित्तिय मामलों में दी जाती है।सरकारी बैंक दिवालिया नहीं होता है ।यदि यह नौबत आता है तो सरकार जानबुझ कर बैंक को दिवालिया कर देती है ।

सरकारी बैंक से लोन लेकर लोग प्राईवेट बैंक खोल लेते हैं तथा लोगों को बहकाते फिरते हैं। ताकि उनके बैंक में लोग रूपये डाले व वे रूपये लेकर भाग जाये। और होता भी ज्यादातर ऐसा ही। लोग प्राईवेट बैंक वालों के चक्रव्ययु में फंस कर ,अपनी बेसकिमती कमाई प्राईवेट कम्पनियों व बैंक वाले लूट ले जाते है। बाद में ,लोग पुलिस को रिपोरट करते घूमते हैं। हर रोज सैकड़ों घटनायें अखबारों छपी मिलती है।

पता नी क्यों लोग जान बूझकर लोगों के छूठे हथकंडों में आ जाते है। जब तक सरकार रहेगी तब तक सरकारी बैंक भी रहेगें। जिस दिन सरकार खत्म हो गई उस दिन सरकारी बैंक समाप्त हो जायेगें। तथा ब्रिटिस कम्पनी राज की तरह, कम्पनियों की गुलामी का राज पुनः आ जायेगा।

हां, यह नौबत भारत जैसे देश के बेवकूफ लोग ला शीघ्रता से सकते हैं। क्योंकि भारत के बैंक कर्मचारी व अधिकारी जो आजकल भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, वे काम नहीं करते है तथा लोन देकर वसूल नहीं करते हैं व बैंक से वि़ आर एस ले कर , प्राईवेट बैंक में अधिक सेलरी पर नौकरी कर लेते हैं।अतः सरकार को सरकारी बैंक दूसरे बैंकों में मिला देते हैं। फिर लोग अपने किये करमों का दंड भोगते हैं।सरकार द्वारा दिये जाने वाले बैंक से बहुत कम रूपयों पर नौकरी करते हैं।

पुराने व नोट बंदी के रूपये

मोदी सरकार अब राशन बन्द कर रूपये देने जा रही है। ये ज्यादातर वे नोट होगें जो जो नोट बंदी में बन्द हो चुके हैं या नकली नोंट है। यह रूपये उन एरिया के लोगों को दिये जाये गेम जहां आबादी अनपढ़ है तथा असली नकली की पहचान नहीं जानती।

रूपये देकर बनियों के साथ मिल कर सरकार आम जनता के साथ धोखा-धड़ी करेगी। जिसमें ऊन्चे भाव पर दुकानदार गरीब लोगों को राशन देगी।बनियों की दुकान का राशन भी सड़ा पड़ा है उसे निकलवाने की शाजिस सरकार व व्यपारी वर्ग कर रहा है। इस पोलिसी से जनता को जगह -जगह धक्के खाने पड़ेगे।

यदि सरकार रूपये देकर गरीब लोगों को सरकारी खरीद मुल्य पर भारतीय खाद्यान्य भण्डार से आनाज दे तो ठीक है। किसी दुकान दार की हेराफेरी व नकली नोट जो सरकार देगी उसे गरीब जनता से ले सके।आगे सरकार अगले चुनाव में हारने का प्रबंध स्वयं कर ले।

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