यदि लोक सभा चुनाव आने वाला है २०२४ का।मैं भारत की जनता की राय जानना चाहता हूं क्या पूरे भारत की जनता मुझे अपना मत अभिव्यक्ति का पक्स देगी।जनता मुझे किसी प्रकार भी नहीं जानती है। जिस प्रकार राज्यपाल व राष्ट्रपति को जनता नहीं जानती है। केवल प्रधानमंत्री को ही जनता सीधे तौर पर जानती है क्योंकि उसे जनता चुनती है चाहे उसे संसद के इलाके का बहुमत न मिला हो। जिस देश की जनता का ७२ प्रतिशत मत सरकार के पक्स में नहीं हैं फिर भी देश में २८ प्रतिशत मत वालों की सरकार है यह तो समय का सरासर अन्याय है।
राज्यपाल व राष्ट्रपति चाहे कितने गंदे व अनपढ़ हो,जिन्हें संविधान के कानून की पालना करने व करवा ने में डर लगता हो । क्या उस पद पर आसीन होने चाहिये। बैचारी जनता तो मुक बधीरो की तरह तमाशा देखती रहती है।न जनता ने उन्हें चुना है। हां मैं असली बात पर आता हूं कि भारत की १०० प्रतिशत जनसंख्या मुझे चुनाव संहिता का पालन करते हुये । चुनाव में नोमिनेशन फिस के इलावा एक पैसा भी खर्च न करूं तो क्या जनता मेरे पक्स में राय देगी।
ऐसा मैंनें क्यों कहा, क्या भारत की जनता जानती है। आज चार साल से ज्यादा समय बाकि है। आपके नुमायन्दे अजमाने के लिये। मैं तो चुनाव खर्च का एक पैसा भी जनता पर टैक्स के रूप में नहीं डालना चाहता। जो अरबों रूपये चुनाव पर खर्च होते हैं।उसको केवल सरकारी अधिकारी कर्मचारी की तन्खाह तक ही सीमित रखूंगा। इस टेलीफोन से पूछ. लिया। चार साल सोचने को जनता को दे दिये।व आज की संसद के न्यायधीश भारत का एक-एक नागरिक बना दिया। अवलोकन व न्याय करना तुम्हारे हाथ में है। बाद में पछताना न पडे़ , अतः समय पर चेत जाये।
नेता लोगों की पहचान भीड़ देख कर न करे। उनके पांव पड़े, भूमी देख कर करें। यदि किसी भी नेता के कदमों के कारण जमीन हरी भरी दिखाई दे ,तभी उसे नेता माने।अन्यथा नहीं।यदि हरी भरी भूमी नंगी व उजड़ी नजर आये तो कदापि नेता न चुने।यह प्रकृति का नियम है व सास्वत सत्य है जो कभी मिटाया नहीं जा सकता है।यदि आज के नेता मेरी तरह टेलीफोन पर राय जानते। लोग उनके पक्स में राय देते तो भारत का हर घर व राह ,आज सोने से निर्मित होती।
सारा पैसा फिजूल खर्च कर दिया जाता है। चुनाव प्रणाली के घटिया नियमों के कारण। सारे बैंक व फैक्टरियां कंगाल हो गये है।नौकरियों से लोगों को निकाला जा रहा है। नौकरियों में बढ़ोतरी की बजाय कटोती की जा रही है। बढोतरी केवल MLA व MP के इलेक्शन में हुये खर्च को वसूलने के नियम बनाये गये है।जैसे हरियाणा की सरकार ने मकान का किराया एक लाख रूपये कर दिया है। यदि विधायको की हेसियत देखो तो उनको किराये के तौर पर एक पैसा भी नहीं मिलना चाहिये। तकरीबन विधायकों के सरकारी निवास के इलावा हर जगह अपने मकान खरीद रखे है। फिर किराये की नौबत कहां से आयी। यदि सरकारी आवास पसंद नहीं आता तो सरकार बनाते क्यों हो। चुनाव नहीं लड़ना चाहिये।
सारे नेताओं के घरों के सामने सूअर लेट मारते रहते हैं व सरकारी आवास में मिन मेख निकालते है। क्या भारत की जनता इतना मंहगा किराया चुकाने के लिये तैयार है क्योंकि यह देना जनता को ही पड़ता है। मंहगाई हकीकत में केवल व केवल चुनाव पर होने वाले खर्च से बढ़ती है।तथा संवैधानिक नियमों के अन्दर इसकी भरपाई नहीं हो सकती है। अतः नेता लोग लूट खसोट करते हैं नाम दूसरा रख लेते है ताकि जनता को पता न चले व संस्य की स्थिति में रहे।
२०१९ के हरियाणा के चुनाव की हकीकत ,किसी ने किसी को चुनाव में खर्च के लिये २ लाख रूपये दे दिये। वह है कोई व्यपारी।अब यह बताओ वह दो लाख रूपये ,दस लाख रूपये बनकर जनता कैसे पड़ता है, जाने। पहले तो व्यपारी अपने ग्राहको को दाम बढ़ाकर कर लूटेगा।जिसका कानून में कहीं भी रिकार्ड न होगा। फिर विधायक जनता को लूटेगा। चुनाव खर्च दिखाकर। फिर पार्टी लूटेगी। फिर चुनाव आयोग का आंकलन लूटेगा। फिर हरियाणा सरकार लूटेगी । उसके बाद भारत सरकार लूटेगी। बजट में टैक्स बढ़ाकर।जबकि यह रिश्वतखोरी नहीं होती तो ३६ प्रतिशत जीएसटी की बजाय २प्रतिशत टैक्स में काम चल जाता। उसमें से एक प्रतिशत बजट बचत अवश्य निकलती ,जो भारत के बजट में स्वपन में भी किसी नेता ने आज तक सोची भी नहीं।।
यदि सोचते तो बचत अवश्य होती ।यह विधि का विधान है।नेताओं ने घाटे दिखाकर व घाटे का बजट बना कर देशवाशिओं को धोखा दिया है। मनमोहन सिंह जब वित मंत्री बने तो सबसे पहला काम बचत करना बंद करवा दिया। पी अफ की बचत जब बहुत होती थी।ब्याज कम कर सारे रूपये कंगाल व्यपारियों के हाथो खत्म करवा दिये। क्या वे रूपये सरकार नहीं प्रयोग करती थी।सरकारी कर्मचारी को १२प्रतिशत ब्याज न दे कर विेदेशी कर्जदारों से उस से मंहगे ब्याज पर उधार लिया। पी, एफ का पैसा कर्मचारी किसी इमरजेन्सी को छोड़ कर , कभी नहीं निकलवाता है।
एक ऐसा जंहासा दिया सरकार ने ,सारे कर्मचारियों को कंगाल कर दिया।वह कंगाली की राह है शेयर मार्किट।इसके हाथ चढ़ गये तो बर्बादी के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगता है।यह गूढ़ रहस्य हर किसी को समझ में नहीं आता है।है सीधा सा नियम ,आप बिना ब्याज के अपने रूपये अनजान जगह पर लगा देते है। ९० प्रतिशत कम्पनियों तो चलती नहीं है बाकि दस ब़ची को तुम्हारे रूपयों की जरूत नहीं होती है। लोगों ने लाभ लेने के लिये शेयर वैल्यू बढ़ाई है कम्पनियों के मालिक ने हमेशा दिवाला पन के सिवाय कुछ नहीं दिखाया। जो संसार में एक नं़ का अमीर है,वह केवल टैक्स अधिकारियों के कारण सम्भव हो पाया है।
ये सब नेताओं को रूपये दे ते है और दुनिया को वहशी भेडि़यों की तरह लूटते है।आजकल यह खौफनाक मंजर हर नुक्कड़ पर मिल जायेगा।पता नहीं भारत की जनता को बुद्धि कब आयेगी।यदि इसी प्रकार की शिक्शा पध्यति व राजनीति रही तो कभी भी सम्भव नहीं है। जनता हर किसी नेता के जिन्दा बाद ,मुर्दाबाद के नारे लगाती है। उन्हें पता नहीं है जो शब्द वे चिला रहे हैं उस का अर्थ क्या है। सीधा सीधा मतलब निकलता है। वह तक तो पता नहीं ,चिलाते रहते हैं।जिन्दा का अर्थ तो जिन्दा है बाद लगते ही ,पहले मरना होता है. वैसे ही मुर्दाबाद में मुर्दाबाद का अर्थ मरा हआ।बाद का अर्थ बाद में। जिन्दाबाद का नारे का अर्थ जिसके लिये चिला रहे हैं उस को मार ने का उद्दघोष कर रहे हैं।़
अब दुनिया बताये कि एेसे भारतीयों का क्या करें।जिसको बोलने वाले शब्द का ग्यान न हो।