हां , करोना का इलाज हर आदमी के पास है। बस , जरूरत है दृढ़ मनोइच्छा शक्तिकी। जो सारी ताकत मन में संजोकर, संकल्प करे कि मुझे कोई करोना नहीं है।न हो सकता है। हर वक्त उसे याद कर धिक्कारे। वह गलती से भी पास नहीं आयेगा।
अब मनुष्य भगवान से बड़ा
करोना के चलते मनुष्य व सरकार ने एक उपलब्धि हासिल कर ली है।अब वह रावण, चण्ड,मुण्ड व हरिणयक्शयप जैसे राक्षस बन गये है।खास बात यह देखने मे यह आई है कि हर सुबह शाम अपनी जान बचाने की मिन्नते जिस भगवान के आगे करता है। वही जब मन्दिर से बाहर आ जाता है तो मन्दिर के घंटे से करोना फैलने लग जाता है कहता है। दो मिनट पहले रूपये ,पैसे-धैले व सेहत के लिए घंटा बजा कर अन्दर गया । क्या तब करोना नहीं फैल रहा था।
क्या अखबारों व सरकार के आदेश ने हर देवि देवता को इतना तुछ कर दिया है कि उनकी अदृश्य शक्तियां समाप्त हो गई । मनुष्य उनसे अधिक ज्ञान वान व शक्तिशाली बन कर उभर आया है।यदि ऐसा है तो, सभी मन्दिर आदि धर्म स्थल सरकार ने तुड़वा देने चाहिए। ताकि पाखंड को बढ़ावा ना मिल सके ।
लेकिन मुझे ऐसा लगता नहीं, न सरकार और न ही मनुष्य भगवान से बड़े बने है। सभी नेता ,ज्योतषी,डाक्टर व मरीज ,दवा देने व लेने से अधिक भगवान का नाम लेते है।अपने घर व मन्दिर में घंटे बजाते है। मैं आपको यह बता दूं कि घंटा बजाने की बजाये ,मंत्र बोलने में संक्रमण फैलता है। करोनो के वायरस का एक और मतलब भी है।वह है
करो ना भीड़ । भिखारी जैसे मांग कर न खाओ। अपने काम धंधे करो ,अपनी नेक कमाई पर ध्यान रखो,जैसे मास्क , दवाईयों व सेनेटाइजर का करोना की बिमारी करवा रही है। इसके पिछे कोई घोटाला भी हो सकता है। व्यापारी समाज मन्दिरों में बैठे पाखंडियों का । सरकार देश की जनता को स्पष्ट करने की कोशिश ईमानदारी से करें। ताकि पूरी जनता सरकार में विश्वास कायम रख सके। यह भी स्पष्ट की सरकार भगवान से बड़ी बन गई हैं , तो बेमतलब मन्दिर आदि जगह पर न जा सके। तथा लोगों के अरबों रूपए बचा सके,जो मन्दिरों में दान दिये जाते हैं।
करो ना करो
करो ना करो लेकिन काम तो हर रोज की तरह करना पड़ेगा। करोना ,यदि काम नहीं करेंगे तो ,कार्य कैसे चलेगा।
करो ना लोगों से बातें।
करो ना गंदगी का फैलाव।
करो ना आदेश का उल्लघंन
करो ना सैर सपाटे।
करो ना होटल में ठहराव।
करो ना खूले मुंह विचरण।
आज का प्रश्न
क्या समाज के हर आदमी के पास करोना का इलाज है? उत्तर कल के आलेख में।
दुनियां में देश,कल के प्रशन का जवाब
दुनियां में भारत ऐसा देश जहां के लोग कानून की बाध्यता की तरह गंदगी फैलाने को अपना कर्त्तव्य समझ, यहां वहां कचरे ढ़ेर लगा देते हैं। कुड़ा करकट कहीं भी डाल देते हैं। इसीलिए भारत को महान कहते हैं।
आकृति
छायांकन व चित्रण एक कठिन व दुर्लभ वस्तु स्थिति है। जो स्थिति आज है ,शायद वह किसी भी जन्म में दोफारा ना मिले। ऐसे अवसर आते बहुत हैं ,संजोकर रखने के लिये। परन्तु यह सब लोग अपने जहन में तो रख लेते हैं। ब्यां करने में भी कोताही नहीं रखते। लेकिन हर समय चित्रण करने के उपाय , उस वक्त मनुष्य पास नहीं होते हैं तो एक कमी जो व्याख्या करने में रह जाती है। उसका मलाल हर पल कचोटता रहता है।
इसी कसमकस को कम करने की कला और विद्या को चित्रण या फोटो ग्राफी कहते हैं। जो आपको हर वाक्या का सही मूल्यांकन व अवलोकन करने की क्षमता प्रदान करती हैं। आपको झूठ बोलने से बचाती हैं। आपके दुःख भरी व परेशान करने वाली परिस्थितियों में मन मस्तिष्क को तरोताजा करती है। इनके द्वारा किसी रमणीय पहाड़ी स्थल का अनुभव घर पर ही किया जा सकता है। जो आपकी तंगहाली की बिमारी से ,बिना एक पैसा खर्च किये, इलाज कर सकती हैं।

कल पूछे सवाल का जवाब
कचरे का एण्डीज पर्वत अमेरिका के न्यूयोर्क शहर के प्रति दिन निकलने वाले कचरे से जनता है। वहा की आबादी बहुत ज्यादा सोने के कारण व कारखानों से निकलने वाले गंद से एक एण्डीज पर्वत के समान ऊंचाई बनाई जा सकती है।
आज का सवाल :- दुनियां में ऐसा कौन सा देश है जहां की जनता गंदगी फैलाने को अपना कर्तव्य समझती है?
उत्तर कल के लेख में।
पान गुटका सरकारी तोहफा
पानी व गुटका खाने से बिमारी व गंदगी फैलती है तो सरकारी तंत्र उसके निर्माण की इजाजत ही क्यों देता हैं। सारी फक्टरियां स्थाई तौर पर बंद करवा देनी चाहिए। इसमें सरकारी की गलत नीति व अज्ञान का जीता जागता उदाहरण है। पान व गुटका शरीर के लिये किसी प्रकार लाभदायक नहीं हैं। ये केवल मांशाहार के दुश्प्रभाव को कम करने के लिये परिक्षण किया गया था जो निष्फल रहा था। वह भी करोड़ो जन्मों पहले। भगवान शिव द्वारा। खावे के बाद पान का बिड़ा दिया जाता था। उसका दुश्प्रभाव भगवान शिव की मूर्तियों व बूतों पर भी देख सकते हैं। शिव जी की मूर्तियों कितनी सड़ी मिलती है। शिव लिंग काले कलूटे व लहूलुहान हर मन्दिर में नजर आते हैं। पहले वह अपनी दवा सुधारने के लिये घंटों धूप में बैठे रहते थे। लेकिन बात नही बनी। फिर बर्फ घंटों बैठे रहते थे। तंग आकर आग के सामने बैठने लगे, परन्तु फिर भी बात नही बनी तो जलकर मरने लगे। तब जाकर उनके शरीर के विषाध कम हुये। शिव जी के भोगों में पान व सुपारी अहम इसिलिये है। शिव मन्दि र के हवन कुंण्ड में पान व सुपारी की आहुती दी जाती है। ताकि वह भंयकर रोग कारक का अन्त कर सके। यह परमंपरा तो कुछ भूखे ब्राहमणों के कारण शुरू की गई है। खानै को कुछ नहीं चढ़ावा आया तो पान व सुपारी से काम चला लिया। पहले तो शिव लिंग भी बाहर धूप में पड़े रहते थे। ताकि सड़े शिव लिंग को सुखा कर ठीक किया था सके। परन्तु कालान्तर में लोगों ने उसे पाखंड का रूप धारण करवा , मकान के भीतर रख लिया। आहुति को आग में न गाल कर, खावे में प्रयोग करने लगे।वह एक आय का श्रोत्र सोने के साथ-साथ बिमारियों का जखिरा बन कर उभर आया।जो आज तक प्रचलित है और भयावह रूप धारण कर चुका हैं।
विकास की दौड़ का पिछड़ापन
आप को जान कर दुःख होगा कि हम इस विज्ञान के दौर में कितना पिछड़ते जा रहे हैं लगता यह है कि हम विकसित होते जा रहे हैं।हमारी अर्थव्यवस्था का मज़ाक उड़ाया जा रहा है। सब कुछ खर्च करने के बाद भी।इसका सीधा सा मतलब है अर्थ व्यवस्था को विश्व स्तरीय न बना कर। केवल देश की सीमाओं के भीतर ही कैद कर रखना। किसी विज्ञापन कम्पनी के विज्ञापन के विश्लेषण से साफ झलकता है।हम किस कदर विदेशी अर्थ व्यवस्था की स्पर्धा में पिछड़ गये है। विमर्श चित्रांकित कार की कीमत से इंगीत होता है। भारत से बाहर 8000 व भारत में 6,00,000 रूपए। यहां फर्क केवल यह है रूपयों की जगह डालर कहा जाता है। है वैसा ही कागज का टुकड़ा। यदि सोने आदि का होता तो न्याय परक लगता। क्या विदेशी कारें इतनी घटिया किस्म की है।या भारतीय कम्पनियां देश के लोगों को लूट रही है। यहां यह मत देखिए कि एक डालर की किस्मत 70 रूपए से अधिक है।उसको भी सब्जी की तरह बेचा जा रहा है। रूपए एक आत्मा व शरीर का रूप है। दोनों देशों के शरीर क्या कभी है जबकि कार तो वहीं है। यदि मान भी लिया जाये फर्क है फिर भारतीय कार की कीमत 8000 रूपये भारत में क्यों नहीं है। वह तो भारत में बनी है। विदेश में नहीं। विदेशी कर व आयात व कस्टम शुल्क भी नहीं चुकाया जाता।देशी कम्पनी लोगों के साथ धोखा कर्मों करती है। यही एकमात्र कारण है जो भारत कभी भी विकसित देश नहीं बनने देगा।
करोना वायरस के प्रति रोकथाम
विश्व व्यापी आवाहन का असर ,भारत के जन मानस पर भी देखने को मिला।हर गांव व गली में गांव के खौफजदा लोग ,अपने मुंह पर रुमाल या किसी कपड़े नाक व मुंह ढके गांव के बाहर से आने वालों को रोक कर पूछ रहे थे। कहीं कहीं पर साबुन या किटाणुनाशक घोल से हाथ मुंह साफ करने के लिए प्रदान किया जा रहा था।
भारत जैसे देश में यह एक उत्साहवर्धक प्रयास सराहनीय कदम है। क्योंकि भारत में कानून व्यवस्था तोड़ने वालों की संख्या हमेशा ज्यादा रही है।इसी तरह लोग जागरूक रहें तो ,देश को एक सुदृढ़ कानून व्यवस्था का रखवाला देश बनाने में देर नही लगेगी।इसका एक सहानुभूतिक फायदा प्रधानमंत्री मोदी को मिल रहा है। कानून की आधारभूत संरचना को नहीं।
यदि इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई तो भंयकर परिणाम भी हो सकते हैं। क्योंकि इससे महामारियां फैलने को बढ़ावा मिलेगा। जिस चीज को निशाना बना कर , फायदा उठाया जाता है उसकी चाहत बढ़ेगी। इसमें कारण बिमारी व मौत हैं। अतः राजनीतिक लाभ लेने से बचें।
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