सौम्य तरीके से विचार व्यक्त करे

अपने मन के विचारों को शौम्य तरीके से व्यक्त करने के मंच के तौर पर प्रयोग कर ,अपनी आवाज जन जन तक पहुंचाने लिये अपनाये:

करोना बनाम मंहगाई भत्ता

सरकार की हालात वैसी ही हो गई है जैसी कुम्हार की कुम्हारी देख कर होती है। जब कुम्हार का जोर कुम्हारी पर नहीं चलता तो वह गधे के कान ऐंठता है।वही हालात सरकार की है। और कहीं जोर न चलता हो तो केन्द्रीय सेवाओं के कर्मचारियों के कान मरोड़ दिये जाते हैं।एक साहसिक व प्रंश्सनीय कदम हैं।

लेकिन तर्क संगत बिल्कुल भी नहीं है।क्योंकि सभी राज्य सरकारें सभी वस्तुओं के दाम बढ़ाने जा रही हैैं। पेट्रोल,डिजल के दाम सरकार बढ़ाती जाती है। तुलनात्मक दर से कभी भी दाम तय नहीं किये गये। कच्चा तेल जब १५० रुपये था अन्तर्देशीय बाजार भाव, तब भारत में रिटेल शूध पेट्रोल,डिजल की कीमत ४५ रुपये थी। अब अन्तरदेशीय बाजार की कीमत १५ रुपये बैरल है। जो अन्तर्देशीय मंहगाई का आधार है तो मंहगाई पहले कम करनी चाहिए। फिर चाहे भत्ता कभी न दो, तो भारत के सरकारी के कर्मचारियों को कोई तकलीफ नहीं होगी।

अन्यथा कालाबाजारी, हेराफेरी ,बेईमानी , नाफरमानी बहुत ज्यादा बढ़ेगी। सरकार का ढांचा हिल जायेगा।दूसरा नायाब तरीका है आर्थिक आपात काल घोषित कर दे। उसके बाद में ये सब काम करने चाहिए।सभी वस्तुओं की नयूनत्म खुदरा मुल्य पहले घटाने चाहिए थे। ताकि जनता में आक्रोश न फैले।

ऐसा न हो कि देश में दूसरा करोना न फैल जाये। वह करोना वायरस से कई गुणा खतरनाक है। सरकार इस बहम में बिलकुल न रहे। कि सहानुभूति सरकार के साथ लोग बरतेगें।ये दान शीलता देखी है उसके रंग व तेवर देखना, कितने भंयकर होगें।लोग सरकार से खुश नहीं हैं, लोग करोना से खुश हैं तफ्तर तक जाना नहीं व वेतन मिल जायेगा। अब आहट तो यूनियनों की आ गई है।देखते हैं ऊंट किस करवट बैठेगा। बिना हड़ताल कर्मचारी मान जायेंगे कि नहीं।

Safety is good weapon For Health

In time of emergency which whole of the world is facing due to the epidemic of a virus called by public Corona. Whose birth place is made known Wuhan in China.is spreading its work sheet all over the world to threat the public that how much it is powerful to destroy the human race.Whole of the world has been put behind the doors.

On the wake of sense ,it is better to be confined in to your home or house to deprive it’s food illness away. Let it roaming in the street with out obstacles and pass on to its death. It is a micro organism which life span is very much shorter to any other creation of nature. It is the men make stronger and dreadful to make the public afraid.

The man only cultivate it with his bad habits. To keep and preserve the dead animals or the waste of any kinds. Which results into science of microbiology.If we have disposed off all the mutilated life or thing in proper manner . We haven’t seen these days of panic.

Now it is better to make your air separate for inhalation. So you can make yourself safe and safety is the main weapon to protect the health from this communicative infection.It better to peep out from the window to see the deserted street and overcast skies to come and go with less or more problems.

In the time of isolation and idleness ,you can utilize the time to read eBooks or other good social books to enhance your knowledge.

 

You can go through the following books.

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Mask Testing

There so many Verity of face masks. The purposes of masks are so many. Some masks are used by police personnel which are made of rubber and have holes in its. These masks are unable to protect the person from infection,but can reduce the pulluted air intake.

Surgical masks are used by medical professionals to reduce the chances of infection to the both the doctor or the patient.The body ‘s exeled germs by respiration are barriered by the mask by the medical staff to promote the health and to protect the health.

In the age of feshion, the mask industry is also affected . The manufacturer make the masks attractive and feshionable. They put plates and layers in masks.If you are using layered and plated masks and use on more than one patient.It may causes you infected with the diseases of the patient.Even if you are checking a normal person,you can be attacked by his expirated air and may fall ill due to non tolerable becteria.

So masks are the protective shield should be health friendly. If you love feshionable masks,then you have to make it disposable, use and burn it.Do not throw it ,it may be such dangerous as Corona havoc.Better use plane masks and made of good quality of cotton, It should not be allergic to skin and Respiratory system of a man. You can have four or five cotton cloth masks . You can alternately use its and disinfect it. It will be economically and hygienicaly good for social use also.

किराये की झोपड़ी या अपना घर

सबको इच्छा होती है आपने घर में रहने की। लेकिन नियती, समय ,नीति व राज यह होने नहीं देता।पता सबको पहले से होता कि जो घर या झोपड़ी का सहारा लिया जा रहा कितना फायदेमंद है चाहे अपना हो या किराये का। झोपड़ी तो मजदूर की होती है, मकान बना ,इतने रहने की।बाद में उनको तो दूसरे स्थान पर जाना पड़ता है यदि बड़ी बड़ी भवन निर्माण इकाईयों की बात है तो। इसमें झोपड़ी तो हट जाती है बिना तकलीफ के। असली तकलीफ तो वह खड़ी कर दी, जो बहुमंजिला इमारत है।उसमें लोग रहते जरूर हैं, करोड़ो रुपये खर्च करके। लेकिन रहते हैं लोग तिसरे दर्जे की जेल से बदतर।

बिना किसी अपराध के बहुत धन गंवाने पर भी इतने भीड़ भड़ाके की जगह मिली जिसमे सांस तक लेने जगह भी ठीक से नहीं मिलती। खर्चों का औड़ नहीं उनमें। बहुत से तो इन खर्चों से तंग आकर ,आत्महत्या कर लेते हैं।उपर से इमारत का कोई भरोसा नहीं कब धराशाही हो जाये। कम्पनी की गलती बनाने में चाहे न हो। लेकिन जो खोखलापन जमीन में गंद निकालने के लिये किया गया है। वह उसे जमीन में धंसने को मजबूर कर देगा। नीचे सिवरेज का सही निसकासन न होने व बोझ से कारण इंगित है। पुन: निर्माण के लायक भूमि रहती नहीं हैं।

सरकार को अब तल पर बने मकान ही बनाने की इजाजत देनी चाहिए।। ताकि घर का स्वामी बन सके तथा करोना जैसी भयानक आपदा से बचा जा सके।बड़े बड़े शहरों की जगह , छोटे छोटे गांव बसाने की नीति अपनानी चाहिए।कल कारखाने भी ,एक जगह से हटा कर पूरे देश में फैला देने चाहिए ताकि वातावरण साफ किया था सके। कारखानों को तो एक जगह पर दो की इजाजत नहीं देनी चाहिए।कम से कम दूरी, दोनों के चारों और पचास किलो मीटर से कम नहीं हो।गांवों की आबादी एक हजार से ज्यादा न हो। दो गांवों की दूरी दो किलो मीटर से कम न हो। ताकि अमीर गरीब शकुन, चैन व स्वस्थ जीवन जी सके।

अमीरों का तो बहुत बुरा हाल है।इसलिये वे झूगी झोपड़ी तूड़वा देते हैं। वै रूपये की अंधी माया छुपाने के लिये व कही चोर चोरी न करले। तो सबसे ऊपर की मंजिल पर रहते हैं। ऊपर नीचे आने जाने का दंड बहुत भोगते है।उनकी समस्या कभी खत्म नही होती है। शायद हो भी नहीं। अमिरी का लालच , दुःख साथ लाती है। वो दुःख ऐसे सोते है उनका इलाज किसी वैद ,डाक्टर व भगवान के पास भी नहीं। राजा मिदास की तरह बहुत से लोगों को चैन से जीने के लिये अमीरी तजनी पड़ी है।

अत: घर अपना जितना हो सके ,छोटा रखे। ताकि , आप से देख भाल कर सके।बे मतलब में दुनियां की बिमारी व बोझ नहीं खिंचना चाहिए।स्वयं के घर से मानसिक बिमारी जड़ से खत्म हो सकती है। सबसे बड़ा कारण है परेशानी का घर ही है।अभी नहीं तो ,कभी न कभी ,करोना जैसी मजबूरी में ,यह नीति तो अमल में लानी पड़ेगी।

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देश में आ गया असली करोना

जिसका डर था वह भयानक राक्षक करोना,अब लोगों को कैसे मारेगा।इसकी कल्पना से ही लोग मर जायेगें। भारत के दुर्भाग्य है इसमें इस तरह की करोना की बिमारी आई। लोगों ने बहुत बढ़ चढ़ कर दान किया।एक होड़ लग गई थी। भगवान से पाप में छूट करवाने की, लिस्ट मे नाम सबसे ऊपर हो, चाहे घर निलाम हो जाये। मर कर भगवान से कह सके कि मैं ने इतने बड़े बड़े दान कर दिये। अब स्वर्ग मेरे हवाले करो।

इसका एक बहतरीन उदाहरण करोना, व लाकडाऊन ने कर दिखाया है, बाकि बचा है भगवान को धमकाना।स्वर्ग छोड़ नहीं तो ,तेरे भी करोना कर दूंगा।अभी तो महीना ही नहीं बिता , षडयंत्र की घिनोनी बदबू से संसार भर दिया। महीने भर से लोगों को काम नहीं है ,डाक्टर व उसका स्टाफ डाकू मलखान सिंह बन गये हैं।उनको रोका भी नहीं जायेगा। यह पहले ही चेतावनी स्वरुप बता दिया था कि वे लुट का माल दान करते हैं। गरीबों में बांटते हैं।

यह भारत है लूटते रहिये,यहां कोई कानून नहीं हैं कि लोगों लूटा नहीं जायेगा।यदि कानून है भी तो क्यों माने तेरे कानून को हमने तो सरकार , भगवान व भिखारियों तक को मुफ्त में खिलाया है। रुपये जो पूरे करने हैं। यह है भारत में दान की परिभाषा। इतना खर्च कर रखा है अस्पताल पर ,कर्ज के तेरा बाप देगा। इन सब बातों का किसी के पास जवाब नहीं है।न हो सकता हैं।

अस्पताल एक ऐसी जगह है जहां राक्षसों के सिवाय कोई नहीं रहता है, इसमें डाक्टर हो या मरीज या सहयोगी। सब एक से एक बड़ा दानव है। क्योंकि अस्पताल ,पताल तो ठहरा। जिसका अर्थ नरक होता है।सब सजा याफता मजरिम रहते हैं। अपने पिछले जन्मों की,न देनदारिया जबरन लूट लेते हैं।लोगों का अपने आप को लूटवाना ,वहां मजबूरी हैं।सब मौत के डर से दिल खोल के लूट रहे हैं।

काफी समय पहले की बात है।किसी के परिवार का कोई सदस्य बिमार था। मेरा भी ,मरीज को देखने व हाल चाल पूछने वहां जाना पड़ा। यूहीं बातों बातों में ,मरीज के रिश्तेदार ने बात कही कि अच्छा धन्धा है जितना चाहो मांग लो। देना पड़ता है। न कम करते हैं न करवाते हैं कहीं से भी लाकर दो देने पढ़ते हैं। उस समय पूरे शहर में दो चार ही हस्पताल थे । अब तो तकरीबन दो तिहाही भवन इस काम में लगे हैं पूरे शहर के।समय ने व लोगों की गलत इच्छा ने दुनियां नरक बना दी।एक ही बात सुनने को मिलती हैं फलां बिमार है देखने जाना है।लोगों की चाहत, हस्पताल व बिमारी बन गये हैं। यह कल युग है जिसमें इच्छा दिन छिपने से पहले पूरी करनी, भगवान की मजबूरी है। क्योंकि उसके पास समस्यों का अम्बार लगा हैं समय कम है अत: शीघ्र इच्छा पूरी की जाती है। यदि सत युग व दूसरे युग सोते तो करोड़ों बर्ष लगते, इच्छा पूर्ती में।

वहां पर मरीज ठीक करने के लिये नहीं खोले हैं हस्पताल। वह तो उस मोटी कमाई के लिये खोले है तो बिन मांगे व पहले ही रुपये मिलते है इलाज बाद में। कोई झंझट नहीं।अत:लाखों रुपये देकर डिग्री ले लेते है। डा़ का ठप्पा लग गया। कमाई तो ,काम न भी आयेगा, तब भी होगी।एडवांस तो मिलता है।धन्य है तू करोना, कुछ भी ना करो तो भी इतनी मोटी कमाई कि संसार दहल जाये। अब देखे कि फेस मास्क व सनेटाइजर से इतनी कमाई हो गई , चाहे कितने ही देश चला लो। इसे बिमारी से न जोड़े। नहीं तो मौत के मरीज कम कर देगें कमाई।

धन्य है तू भारत , ईमान की न सही, लूट की कमाई के तरीके तो ,बिना फिस बता दिये। नहीं तो प्राइवेट स्कूल वाले फीस ,लाखों की जगह करोड़ों कर देते ।


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निजीकरण और अलगाववाद

निजी शब्द कितना लोक लुभावन , व्यक्तिगत, स्वार्थी,ताकतवर हैं, इसकी कहानियां व इतिहास सुन व देख कर दुनियां सिहर उठेगें। यही शब्द है जिसके कारण आज तक इतिहास बनते, बिगड़े रहें। लड़ाई,युद्ध ,बंटवारा सब इस शब्द के कारण सोते हैं। यदि इस शब्द की उत्पति नहीं हुई होती तो यह दुनियां कभी भी रक्तरंजित नहीं होती। कितनी मोहकता छुपी है इसमें निज जो आदमी को अपनत्व का अहसास कराता है जब निजी कहलाता है तो कितना खतरनाक रुप धारण कर देता है। यहां अपना कहने वाला ही एक पल की जिन्दगी कर देता है।अपना भी कहता है और दूर भी करता है। यहां उसका निजी मामला कहता है।जब तक रूपये पैसे व फेक्टरी चलानी है तो सब निजी ,लोग मालिक के।चल पड़ी रूपये आये, तो निजी का अर्थ तू न जी, अर्थात बाहर का रास्ता नाप ,तेरा मेरा कोई सम्बंध नहीं।

अब यह शब्द विशालता ग्रहण करता है।जिसे निजीकरण कहते है। यहां शब्द अपनी भंयानकता , दोगलापन ,छिछोरापन,कमीनापन सब दिखाता है, बिना कुछ खर्च किये। सब खर्चों के रूपये,हथियारों व लड़ाई पर खर्च करवाता है ताकि निजी की ताकत का अहसास करवा सके। ताकत के दम पर। ताकत तो रूपयों ने दी है। बस यहीं पर निजीकरण , मार खा जाता है। क्योंकि रुपयें आज तक किसी के नहीं हुये हैं ध्यान से सुन लो। रुपयें तो घमंड के तौर देकर ,फरार हो गये।उनके तो हथियार खरीद लिये।

यह हथियार शब्द है काम का, जिसने इसे गले लगाया।उसका अहंकार क्षण में मिटा दिया। इसकी यारी ऐसी की हाथ कभी नहीं छोड़ता।चाहे मर क्यों न जाये।अब निजीकरण जीने की अभिलाशा छोड़, अलग सम्राज्य के युद्ध के लिये ,युद्ध भूमि में तैयार है। उसे एक अलग देश चाहिए उसकी ताकत बहुत हो गई है , वैसे हजारों पड़े हैं युद्ध भूमि के बाजार में। खरीददार वैसे तो कम हैं लेकिन समय की मंडी में भीड़ लगी पड़ी है।

समय का हथियार तो ऐसा ,अपना कुछ भी खर्च नहीं करता।औरों को मार कर चलता बनता है।भई, समय हम तेरे साथ में, पूर्व की भांति।अब चाहे सारी दुनियां मरे , हमें निजीकरण का डर नहीं। जो महीने में अपने लिए मरने वालों को चार बार मारता है।उसके पास कर्मों रहे। जब रुपयें बहुत-बहुत ज्यादा मात्रा में लोगों के पास हो, उसको आर्थिक मंदी कहते हैं। जो आजकल आई हुई है। उसके दुष्परिणाम करोना जैसे घटनाक्रम समय के हथियार हैं जो स्वयं तो कुछ पैदा नहीं करता, लेकिन उन्हीं के असलाहों से उन्हें धराशाही कर देता है।

अब देखते हैं निजीकरण कि आंधी भारत के कितने टुकड़े करेगी। सतर साल तक भी जो सामाजिक वाद व सहकारी सहयोग की राजनीति कायम न रख सके।पुन: लड़ाई झगड़े की राजनीति ग्रहयुद्ध के रुप में ला रहे हैं। भविष्य में इसके दुष्प्रभाव देखने को अवश्य मिलेगें।बेहतर। होगा नीजिकरण त्याग दें। इजरायल व गाजापट्टी भारत को न बनाये। जो निजीकरण की लड़ाई लड़ रहे हैं।

सीधी सी बात

कहां तक देखें व सुने केवल उतर एक ही मिलता है करोना के फैलने व जन्म की कहानी में।लोगों द्वारा फैलाई गंदगी के कारण।कितने ही शौध कर लेना किसी का असर नहीं होगा, केवल आपके द्वारा फैलाई गंदगी को जलानें के सिवाय।किसी सांईसदान की जरूरत नहीं।  कि फलां बिमारी की दवा बनायेगा।हर जगह वह व देशों में पशु-पक्षी मार कर तो  लोग खा लेते हैं उसके बचे अंगों के कचरे को यहां वहां फैक देते हैं, जिसके कारण हमेशा माहमारी फैलती है।सदिया नहीं युग तक बीत चुके हैं सृष्टियां करोड़ों बार उजड़ चुकी हैं लेकिन मनुष्य ढाक का तीन पात ही रहा।सुधरा नहीं, दण्ड भोगता रहा।

मरना गंवारा परन्तु अपनी फैलाई गंदगी समेटनें में कभी दिल चस्पी नहीं ली और करोना जैसी सकड़ों जख्मों को लेकर अगले जन्म की यात्रा पर निकल पड़े। आंख खुली तो उसी कुरड़ी के ढेर पर फिर जन्म ले लिआ,आदत और सबसे मन पसन्द जगह छोड़ कर मरे थे।  फिर बस गये जन्म लेकर ।कितना बड़ा वैज्ञानिक हो या भगवान, मुर्गा मार कर पंख फैलाये हैं तो ,पंख तो ईक्कठे भी ,वैज्ञानिक व भगवान  को ही करने पड़ेगें।करोना की चिन्ता छोड़, विषलें अंग बिखरायें हैं उनका समाधान करों।

गंदी वायु पर धारा 144 व लोकडाउन लागू नहीं होते हैं। बैगर वारंट के आपके शरीर के अन्दर जाने की इजाजत ,उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। यदि यह अधिकार छिनने की कोशिश की तो प्राण -पखेरू ढूढे भी नहीं पायेगें। कहां गये।वह सातों दरवाजों के भीतर बैरोक-टोक जायेगी। मौत के सिवाय उसे कोई नहीं रोक सकता है। इस हाल में आपके पास एक ही विकल्प बचता है, वह  है कि वायु का मान सम्मान करें, उसे गंदा होने से बचायें।ताकि वह गंदी होकर तुम्हें गंदा न करें।अतः सरकार को बुचड़खानों का सफाया करना चाहिये। ताकि स्वचछ वायु सांस लेने को मिल सके। मोदी सरकार नारे को ,हारा न कर। स्वच्छ भारत का निर्माण का नारा जो दिया है , उसे पूरा करें।

जितना खर्च दवाओं पर बर्बाद करोगें , उससे आधे में सफाई व कसाइखाने बंद हो सकते हैं जो बैवकूफी तीन महीनों तक मुफ्त में राशन देने की बात कही हैं वह सफाई के बदले में दिया जायेगा ,कह सकते थे, क्या कहेगें। पिछले सात वर्ष से जो भिखारी व मुफ्तखौर भारतीय जनता पार्टी ने पाले हैं साढे तीन व उससे कम में राशन देकर पाला है जिनकी आबादी देश में सतर करोड. से ज्यादा होगी। यदि उनके हाथ में उसी दिन एक झाड़ु पकड़ा दी होती तो भारत करोना के भय से दुबका न बैठ कर , सोने के सदृश चमकता होता। सम्भल जाओं अभी कुछ नहीं बिगड़ा है।जिस देश में सतर करोड़ लोग ,भिखारियों से बदतर स्थिति में पहुंच गये हैं।

नेता होने के नाते बी. जे. पी. या दूसरी पार्टियों के सर्वे में वोट बैंक तो  आ गया , साथ में करोना नाम का दहेज लेकर आया है।अब विवाह करना बाकि हैा गंदगी के साथ या सफाई के साथ । मेरे सर्वे के मुताबिक सतर करोड़ लोग बि. जे . पी .के साथ है यह बात झूठ नहीं है। लेकिन नदी में जब बाढ़ आती है तो पानी का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन किनारा ,आपना अस्तित्व तक खो देता है और मिट्टी लाकर नदी का किनारा बनाना पड़ता है। फिर देखते है क्या न्याय मिलेगा।आगे क्या होता है व राजनैता कैसी राजनीति करते है।

ज्ञान का भंडार

ज्ञान एक ऐसी वस्तु है चुराई नहीं जा सकती हैं ,केवल प्रदान किया जा सकता है।वह आज्ञा व शिष्य तत्व के अधिन रह कर। यदि आप चोरी कर किसी की पुस्तक से कुछ हासिल कर सकते हो तो नामुमकिन है। मैं अपने बचपन से आज तक का अनुभव साझा कर रहा हूं। जिसने भी किसी ने किताब की चोरी की है वह उस किताब के एक पन्ने का ज्ञान भी ग्रहण नहीं कर सका। विध्या ग्रहण बीच में ही छोड़ना पड़ा।यदि कोई किसी की किताब लेकर देनी भूल गया। या जान बूझ कर नहीं दी।तो दोनों अवस्था में ,उसको ,समय पर ज्ञान याद नहीं रहेगा। उसे भूलने की बिमारी हो जाती है।

अत: ज्ञान प्राप्त करने से पहले अपने ज्ञान चक्षु खोल कर रखने चाहिए। व ज्ञान प्राप्त करने के लिये संकल्प लेना जरुरी है कि किसी प्रकार के छदम का सहारा न लूंगा। तो जी जीवन परयंत कोई समस्या नहीं पैदा होगी। नहीं तो करण की भांती समय पर शिक्षा काम नहीं आयेगी। सम्पूर्ण विश्व का सबसे महान धनुर्धर होते हुये भी। उसकी जगह, अर्जुन को महान धनुर्धर घोषित कर दिया था। जब कि अर्जुन के तो हाथ पैर कांपते थे युद्ध के नाम से। यह सब जानते हैं। महाभारत के युद्ध की गाथा से। करण के साथ छद्म के बदले छदम हुआ और मारा गया। सब जानते थे कि करण को कोई योद्धा युद्ध में हरा नहीं सकता है।

अब सभी विध्या लेने वालों ने ध्यान रखना है कि किसी प्रकार का छल न करें ताकि भविष्य में आपको व आपके बच्चों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। नहीं तो आपके बच्चे बड़े तो छोड़, भिखारी भी नहीं बन पायेगें। ज्ञान के लिये अपनी पुस्तके खरीद के रखें।बेचे नहीं।उसके संदर्भ की कब जरूरत आन पड़े।अपने पास सहेज कर रखे।जरूरत पढ़ने पर सहारा लिया जा सके। आपकी पहली कक्षा से लेकर आज तक की पढ़ी किताब की कब जरुरत पड़ जाये।कहा नहीं जा सकता।

मुझे तो हजारों बार आवश्यकता पड़ी, लेकिन ढूंढ़ने में बहुत परेशानी हुई। असली वस्तु मिली भी नहीं । बेचने व कुछ और बनाने के बाद।अत : आपसे अनुरोध है कि किसी किताब को लिफाफों में तब्दिल न करे।लिफाफे आपके नहीं होते हैं।न उनसे ज्ञान आपको दोबारा मिल सकता है।यदि आपकी पढ़ी किताब घर रखी है तो उसे आपकी घर वाली व बच्चे , अपने आप ज्ञिग्यासा वश पढ़ लेगें। जो बातें, आपको उन्हें समझाने में वर्षों लगते। वह गर्भ में या अपने आप पढ़ कर सिख लेगें। आपकी जटिल समस्यों का हल आसानी से हो जायेगा।

ज्ञानवर्धक व स्पर्धात्मक पुस्तकों के लिये निम्नलिखित पर सम्पर्क करें।

भविष्यवाणी

पिछली सदी के क्रिया कलापों के आधार पर इस वर्ष के अंत तक कऱोड़ों लोग प्रकृति के कोप का शिकार होगें। लेकिन इसमें डरने की कोई बात नहीं है। सौर मंडलीय घटना क्रम का साधारण सा कार्य है। जब कोई ग्रह रहने लायक नहीं रहता तो उसका शौधन करने के लिये, प्राकृतिक आपदाओं के रूप में उस गृह को तोड़ फोड़ कर रहने लायक बनाया जाता है।जान माल का नुकसान तो बहुत होगा। लेकिन जीने के लिये अच्छे ग्रह मिल जायेगें।फिर भी हमें डर व खौफ में रहने की जरूरत नहीं है। वह मौत स्वभाविक भी हो सकती है।

लोग मर तो करोना से रहें हैं लेकिन वे सब स्वभाविक मौत के रूप में हो रही हैं । करोना का तो नाम भी ऐसा है कि करो ना चिन्ता , मरना एक खेल है इस खेल में जीवन व मौत दो इनाम रखे है किसी जीत का उपहार पहला होता और किसी का दूसरा । यह एक ऐसा खेल है जिसको दोनों इनाम मिलते है।जीवन के बाद भी मौत व मौत के बाद बाद भी जीवन । इसमें हार किसी की नहीं होती है। बस नये तरीके से वही गेम खेलने चल पड.ते हैं।

करोना की इस घड़ी में , करो सब्र मिलने का । समय याद दिलायेगा आंसू क्यों प्यास बुझाते हैं।बाहें फैलाना छोड़ के हाथ जोड़े पाते हैं।समय ही एक ऐसा मिला जो हर जगह हर जख्म का न्याय देता मिलता हैं। करोना इन्तजार किसी का , अपने कर्म किये जा अपना। करोना तो नहीं करेगा कुछ, मरना दूर करेगा तू।छन कर सांसे आयेगी ले लेना एक कफन तू। करोना तो मर जायेगा , यह एक जतन करले तू।.,,

 

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