सारे ब्राहमण व पंडित तथा बाबे भिखारी सब माला हाथ में लिये फिरते हैं लेकिन उन्हें पता नहीं यह क्यों दिया जाता है । पूछने पर केवल इतना ही कहते हैं कि हमारे गुरू ने अपने आराध्य का नाम लेने व मनन करने के लिये दिया जाता है। लेकिन यह सच्चाई बिल्कुल भी नहीं है।इसके पिछे एक बहुत ही सटीक कारण तथा उसका प्रयोग इलाज करने के लिये किया जाता है।
माला हमेशा हाथ के अंगुठा व तर्जनी उंगली से किया जाता है जो क्रमशः ऱाक्षश गुरू शुक्राचार्य तथा देव गुरू बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी परस्पर दुश्मनी है जो मनुष्य के शरीर में ही वास करते हैं , लेकिन उनके कर्म अलग अलग शैली के होते है। जब उनसे सबंधित किसी रोग का उपाय करना हो तो और जब दोनों की दशा एक साथ आ जाती है तो यह माला फेरने की विधा बड़े काम करती है जो मात्र काष्ठ की बनी होती है। से फेरने पर ।
काठ एक कुचालक होता है तो वह दोनों गुरू के नेगेटिव व पोजिटिव, किसी भी प्रकार के विचार हो उसे टकरा कर शरीर में उपद्रव होने से शरीर का बचाव करते हैं। एक मणका एक दिन व एक ग्रह का परिमाण होता है जो 108 बार गिनते है तो वे विचार हर रोज 108 ग्रहों पर फैंक दिये जाते हैं तथा आप बुरे प्रभावों से बच जाते हैं। इससे अधिक सटिक कारण है जो आप को शुक्राचार्य के काम व वासना विचारों का शरीर से हरण करते हैं जो बलात्कार व शारीरिक सौशण करवाना चाहते हैं। जाहे कोई गुरू क्यों न हो वे सब अपने शिष्यों तथा उनकी पत्नियों का शारीरिक सौशण करना चाहते हैं ।
यह काठ की माला ही ऐसा साधन जो आपको बचा सकती है आपको उनके बुरे विचारों व नजरों से । क्योंकि मणिये जो सुई व धागे का भोग झेल चुके है , वे माला फेरने वाले के शरीर को बचा लेते हैं जबकि अन्य तरह की मालायें शारीरिक सौशन ज्यादा करवाते हैं जैसे मोती माला इन्द्रदेव, चांदी की माला से चन्द्रदेव , क्रिस्टल की माला शुक्राचार्य से ,सोने की सूर्यदेव से, तथा अन्य धातु की माला उससे नियत देव व दानव से ब्लात शौसन करवाते है यहां शनि देव ही ऐसे देव है जो शारीरिक शौसन नहीं करते हैं क्योंकि वे नंपुशंक है । इसका उदाहरण आप भैस से ले सकतें है वह लोहे की बेल पकड़कर ही ग्रभ धारण करवाई जाती है तथा उसका दण्ड उस भैंस से मालिक को भोगना पड़ता है।
अतःआप काठ की माला ही ले व उसे शरीर पर कदापि धारण करे । धारण करने शौसन अवश्य होगा ही ।
