आज कल लोगों की बहुत ही गलत आदत हो गई है। हर किसी को बाबा बुला देते हैं जिससे उसके होने या न होने का कोई मतलब नहीं रहता है।इससे वे ताकतें नाराज हो जाती हैं। जब वे है ही नहीं उस सम्बोधन के नाम बन्धन मे तो वे कुछ भी नहीं सुनते हैं चाहे उनके बिलकुल पास खड़े हो। यह हर किसी के साथ में होता हैं। जब तुम्हारा नाम ही नहीं है तो क्यों सुनोगें।
यही बात गोगा पीर पर भी लागू होती है वह एक क्षत्रिय थे , न कि एक बाबा भिखारी। जब उनको बाबा के नाम से पुकारा जाता है तो वह नहीं सुनते हैं। दूसरी तरफ कुछ बाबे मरे पड़े हेै , वे बाबा कहने पर आ जाते हैं भिखारी के पास देने को कुछ नहीं होता सिवाय भिख के।अब सालों से वहां भिखारि से भी खराब हालात हैं। अब तो साल में लगने वाले मेले को भी बंध कर दिया है । बाबा कहने का परिणाम।
यदि किसी क्षत्रिय मृत आत्मा को आघात न पहुंचाया होता तो आज गोगा पीर का मेला मेड़ी लगता।अब यह मेला हिसार जिले के नंगथला गांव में दादा सुलतान पीर की दरगार पर भादवे के चांदने बीरवार व बुधवार को लगेगा । पहले भी लगता था फिर मेड़ी की लाग दी जाती थी ।सभी गोगा पीर के धोकने वाले , पूरे साल भर भी के बीरवार व बुधवार को मेड़ी की लाग दे कर जा सकते हैं।
यह यहां का भी नियम है कि दादा सुलतान कहना पड़ता है , यह आवाज अनजान को तो समझा देती है लेकिन चालू बनने वाले का दण्ड अवश्य मिलता है चाहे तो आजमा के देख लेना। बाबा शब्द कहना दण्ड का कारण बनता है। वहां पर लोहे की छड़ों से अपराधी को पिटा जाता है ।
