गंगा नदी का दुर्भाग्य भारत के लोग व ऋषि मुनि व बाबा लोग कभी नहीं सुधरने देते हैं कुम्भ के मेले में लोग जब अपना बुरा भाग खत्म करने जाते हैं तो गंगा का भला कैैसे हो सकता है जब एक आदमी का बुरा भाग उस आदमी का भला नहीं होने देता । तो सोचो गंगा को करोड़ों लोग अपना बुरा भाग सोपनें चले जाते हैं उसकी हालत कितनी बुरी होती है अंदाजा वहां एक बार गये तो देख कर लग जायेगा।
इतनी गंदी जगह कोई नहीं जायेगा , जिसमें नंगे भिखारी बाबे तक नंगा नाच कर गंगा की इज्जत लूटते है अपने गंदे विचार उसमें परवाहित करते है सारे शहर का मल मूत्र गंगा में बहाते हैं उसी मल मूत्र मिले जल को पवित्र बताना कहां तक उचित व न्याय संगत व तरक संगत हैं फि र कहते है उस गंदे जल को पिओ वअपने घर में रखो व छिड़को जो दुनियां की गंदे विचारों व मानसिकता से ऊर्जावान बना दिया जाता है।
क्या इतनें गंदे पानी से करोना से भी भंयकर रोग नहीं फैलेगें। जब तुम अपनी गंदगी किसी दूरे पर फैंक कर आते हो तो क्या गंगा वह गंदगी वापिस तुम्हारे घर में पहले से भी भंयकर रोगकारक जल देकर नहीं भेजती है जिसमें दुनियां भर के दुर्गुण भर जाते हैं। वहां से लोग सामुहिक बलात्कार की भावना का सृजन कर घर लाते हैं जो घटनायें आज प्रत्यक्ष में सबको देखने को व्यापक रूप में मिल रही हैं
गंगा स्नान से योन शोसन की भावना भी भंयकर रूप से बढ़ती है जो हम हर रोज देखते हैं क्यों न इस कुप्रथा कुम्भ मेले का बहिष्कार करें।यह था तो नारी को न्याय दिलाने के लिये, परन्तु लोग उसी की इज्जत लूटने का सामूहिक उत्सव मनाते हैं य़ह बाहर गये पति की पत्नी पर लगाये इल्जाम का न्याय दिलाने , देवी अंजनी को। जब उस की सास ने अंजनी पर चरित्र हिनता का इल्जाम लगाया था।
अब तो बेचारी गंगा भागीरथ के पूर्वजों को पानी पीलाने आयी थी का सामूहिक बलात्कार करने की प्रथा शुरू कर दी है बुध की मां व बृहस्पति की पत्नी को न्याय न देकर, देव राज इन्द्र व चन्द्र देव के गुण्डों ने शक्तिशालनी गंगा से महा दुरव्यवहार करना शुरू कर दिया है।यदि आप अपने भविष्य व अगले जन्मों को सुधारना चाहते हो तो गंगा स्नान के लिये नहीं जाना चाहिये , देख कर चाहे आ जाओ।
