करोना अब लोगों के जी का जंजाल बन गया है, लोग दहस्त में रहते हैं जबकि यह है कुछ भी नहीं। एक हव्वा बना दिया गया है। जिसका समाज के लोगों के आर्थिक व सामाजिक पहलू पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है।लोगों के खर्च बढ़ गये हैं जिसे देने में वे सक्षम नहीं हैं इसको समाप्त करने का एक ऐतिहासिक मौका 20 जुलाई को आया था , सरकारी बंधनों के कारण विफल हो गया है।
कोई भी रोग दोष पूर्व जन्म के कर्मों कारण होता है इन्ही के कारण आध्यतम का प्रादुर्भाव हुआ था। उसी में में इसके इलाज का वर्णन मिलता है। मनुष्य शरीर कई योनियों से मिल कर बना होता है जिनकी संख्या 84 लाख के बराबर होती है। इसमें संख्या कम भी हो सकती है, जिस योनि से मनुष्य जन्म लिया है उस योनि का मनुष्य पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है तथा रोग भी उसी योनि से सम्बंधित होते हैं।
यदि उस योनि का दान बचपन में ही कर लिया जाये तो रोग होने की उम्मीद ना के बराबर हो जाती है। वे सब उस योनि के गले सड़े शरीरों तक सिमित हो जाते हैं, यदि दान न किया गया हो तो ,उस योनि की तकलीफें रोग व दर्द बन कर उभरती है, इसलिये योनिदान कराया जाता है ताकि आपका व उनका कल्याण हो सके। इसके लिये उन सुक्ष्म शरीरों को अग्निहोत्र के माध्यम से जलाया जाता है।ईसके लिये कुछ दिन निर्धारित होते हैं उनहीं पर इनको किया जाता है।जैसे अमावस्या,पूर्णिमा व जन्म दिवस। जन्म दिन पर मोमबती जलाना इस बात का ध्योतक है।
बीस जुलाई को जो अमावस्या थी , वह पचास वर्षों से ज्यादा के रोग समाप्त कर सकती थी । यदि लोगों ने अपने तर्पण व योनिदान किये होते। यदि सरकार ने बंदिशें डाली थी तो, राष्ट्रपति व प्रधान मंत्री ने सामुहिक तौर पर पूरे देश के लोगों की योनिदान व तर्पण करवा देना चाहिये था। अब देखते है अगला संयोग कब बनेगा ।व लोगों को करोना से मुक्ती मिलेगी।मृत्यु उस योनि के शाकसब्जियां व पशु खाने से होती है। यह सब तांत्रिको को छोड़ अनजाने में होता है। तांत्रिक जानबूझ कर हत्या करते है, अपने स्वार्थ के लिये।
