हरियाणा प्रदेश यातायात के साधनों के विषय में पूरे भारत में अवल गिना जाता है। इसकी बसों की सेहत काफी ठीक ठाक है। सेवा का गौर करे तो सही नहीं कहा जा सकता, लेकिन दिखाया बिलकुल ठीक जाता है।ज्यादातर समय पर बसे नदारद मिलती हैं।दो निर्धारित पर केवल एक बस चलती है, या बिलकुल नहीं चलती है। यह प्रयोग हरियाणा बना तब से निभाया जा रहा है।
बसों पर बोर्ड़ कहीं का लगा होता है , लेकिन जाती आधे रास्ते तक,सवारियों को बीच में उतार दिया जाता है, यह करोना से पहले का हाल है , करोना के बाद तो यात्रियों की हालात पतली हो गई है। साढ़े पांच के बाद कोई बस नहीं मिलती है।किराया परिचालक मनमानी से वसूल रहे हैं। दिन में एक ही जगह का किराया दो तीन बार बढ़ा दिया जाता है।
सोशल दूरी बनाने के लिये जो किराया सरकार ने बढ़ाया है क्या करोना समाप्ती पर , घटाया जायेगा। या ऐसे ही जनता को लूटते रहेगें। बसों में तो आजकल 52 सवारी से ज्यादा भी हो जाती है। यदि करोना का प्रभाव कम करना है तो 2, 3 के साथ की सीटों की बजाय एक लाइन में एक सीट की तीन लाइनों की बस चलानी चाहिये। वे बसें माइलेज भी अच्छा देती है बसें स्पेसियस भी होगी। सोशल दूरी भी कायम रहेगी।
इन बसों में औरतों व लड़कियों के साथ अभद्र आचरण करने के तरीके कम हो जायेगें।संक्रमण फैलने का खतरा कम हो जायेगा। रोजगार के साधन बढ़ेगें।चालक, परिचालकों को अधिक रोजगार मिलेगा। बस निर्माता कम्पनियों में रोजगार अधिक मिलेगें।बस सरकार लोगों के हित में सोचे तो ही यह सम्भव है अन्यथा
जैसे सरकार पहले लूटेरों की भांती, लोगों को लूटती रहेगी। हरियाणा 1970 से हरेक गांव को पक्की सड़क से जोड़ने वाला पहला राज्य का दर्जा रखता है। जब तक बंशीलाल की सरकार रही , तब तक हरियाणा के हर ऐक गांव में सरकारी बसें जाती रही। जैसे जैसे दूसरी सरकारे आई, गांवों से सरकारी बसें बंद कर दी गई। प्राइवेट बसें आई, लेकिन किराया गांव तक का वसूल करते हैं और गांव से 2,3 किलो मिटर दूर उतार कर चले जाते हैं।
हरियाणा में ऐसे गांवों की संख्या हजारों में है जहां कोई बस नहीं जाती है, किराया देने के बावजूद भी।
