राहू व केतु ग्रह ने सूर्य देव के सामने आकर अपने ग्रह के बुरे प्रभावों को नष्ट किया। यह ग्रहण और खुद नही होता है वह केवल प्राकृतिक नियमों का पालन सौर मंडलिय व्यवस्था, हमेशा करती रहती है।शनि ,राहू व केतु ग्रह सूर्य से इतनी दूरी पर है कि वहां पर सूर्य का प्रकाश बहुत ही कम मात्रा में पहुंच पाता है। वहां का नजारा वैसा ही रहता है जैसा आज ग्रहण के वक्त जो अंधकार मय तेज था
।इससे राहू, केतु और शनि ग्रह की गंदगी नहीं जलती है।उन ग्रहों पर औध्योगिक क्रियाकलापों के मल को जलाने के लिए सूर्य के निकट आते हैं और अपनी गन्दगी जला कर चले जाते हैं। सूर्य के तेज का ग्रहण से किसी प्रकार का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। बल्कि बहुत अच्छा प्रभाव होता है। कम रोशनी होकर फिर तेज बढ़ता है तो हानिकारक तत्व व जीव नष्ट हो जाते हैं।दुष्परिणाम केवल उन पिण्डों के कारण होता है जो पृथ्वी व सूर्य के बीच आते हैं। उनके चले गंद से जो गैस हमारे गृह के वातावरण में प्रवेश कर नुकसान पहुंचा सकती है। जैसे बुध व शुक्र गृह पर गंदगी नहीं होती है। अतः यह भ्रम मत पालिये कि सूर्य के देखने से नुकसान हो सकता है। सूर्य देव तो हर रोज आते हैं फिर तो सब अंधे या बिमारी हो जाते।इस ग्रहण में राहू ने जम कर , राहू गृह पर आग लगाई। और अपना वातावरण साफ किया। अपने गृह के लिए ज्योति बटोरी और अपनी राह हो लिये। सूर्य देव केवल दूज व तीज के चंद्रमा की तरह नजर आए।
