सरकार की हालात वैसी ही हो गई है जैसी कुम्हार की कुम्हारी देख कर होती है। जब कुम्हार का जोर कुम्हारी पर नहीं चलता तो वह गधे के कान ऐंठता है।वही हालात सरकार की है। और कहीं जोर न चलता हो तो केन्द्रीय सेवाओं के कर्मचारियों के कान मरोड़ दिये जाते हैं।एक साहसिक व प्रंश्सनीय कदम हैं।
लेकिन तर्क संगत बिल्कुल भी नहीं है।क्योंकि सभी राज्य सरकारें सभी वस्तुओं के दाम बढ़ाने जा रही हैैं। पेट्रोल,डिजल के दाम सरकार बढ़ाती जाती है। तुलनात्मक दर से कभी भी दाम तय नहीं किये गये। कच्चा तेल जब १५० रुपये था अन्तर्देशीय बाजार भाव, तब भारत में रिटेल शूध पेट्रोल,डिजल की कीमत ४५ रुपये थी। अब अन्तरदेशीय बाजार की कीमत १५ रुपये बैरल है। जो अन्तर्देशीय मंहगाई का आधार है तो मंहगाई पहले कम करनी चाहिए। फिर चाहे भत्ता कभी न दो, तो भारत के सरकारी के कर्मचारियों को कोई तकलीफ नहीं होगी।
अन्यथा कालाबाजारी, हेराफेरी ,बेईमानी , नाफरमानी बहुत ज्यादा बढ़ेगी। सरकार का ढांचा हिल जायेगा।दूसरा नायाब तरीका है आर्थिक आपात काल घोषित कर दे। उसके बाद में ये सब काम करने चाहिए।सभी वस्तुओं की नयूनत्म खुदरा मुल्य पहले घटाने चाहिए थे। ताकि जनता में आक्रोश न फैले।
ऐसा न हो कि देश में दूसरा करोना न फैल जाये। वह करोना वायरस से कई गुणा खतरनाक है। सरकार इस बहम में बिलकुल न रहे। कि सहानुभूति सरकार के साथ लोग बरतेगें।ये दान शीलता देखी है उसके रंग व तेवर देखना, कितने भंयकर होगें।लोग सरकार से खुश नहीं हैं, लोग करोना से खुश हैं तफ्तर तक जाना नहीं व वेतन मिल जायेगा। अब आहट तो यूनियनों की आ गई है।देखते हैं ऊंट किस करवट बैठेगा। बिना हड़ताल कर्मचारी मान जायेंगे कि नहीं।
