जिसका डर था वह भयानक राक्षक करोना,अब लोगों को कैसे मारेगा।इसकी कल्पना से ही लोग मर जायेगें। भारत के दुर्भाग्य है इसमें इस तरह की करोना की बिमारी आई। लोगों ने बहुत बढ़ चढ़ कर दान किया।एक होड़ लग गई थी। भगवान से पाप में छूट करवाने की, लिस्ट मे नाम सबसे ऊपर हो, चाहे घर निलाम हो जाये। मर कर भगवान से कह सके कि मैं ने इतने बड़े बड़े दान कर दिये। अब स्वर्ग मेरे हवाले करो।
इसका एक बहतरीन उदाहरण करोना, व लाकडाऊन ने कर दिखाया है, बाकि बचा है भगवान को धमकाना।स्वर्ग छोड़ नहीं तो ,तेरे भी करोना कर दूंगा।अभी तो महीना ही नहीं बिता , षडयंत्र की घिनोनी बदबू से संसार भर दिया। महीने भर से लोगों को काम नहीं है ,डाक्टर व उसका स्टाफ डाकू मलखान सिंह बन गये हैं।उनको रोका भी नहीं जायेगा। यह पहले ही चेतावनी स्वरुप बता दिया था कि वे लुट का माल दान करते हैं। गरीबों में बांटते हैं।
यह भारत है लूटते रहिये,यहां कोई कानून नहीं हैं कि लोगों लूटा नहीं जायेगा।यदि कानून है भी तो क्यों माने तेरे कानून को हमने तो सरकार , भगवान व भिखारियों तक को मुफ्त में खिलाया है। रुपये जो पूरे करने हैं। यह है भारत में दान की परिभाषा। इतना खर्च कर रखा है अस्पताल पर ,कर्ज के तेरा बाप देगा। इन सब बातों का किसी के पास जवाब नहीं है।न हो सकता हैं।
अस्पताल एक ऐसी जगह है जहां राक्षसों के सिवाय कोई नहीं रहता है, इसमें डाक्टर हो या मरीज या सहयोगी। सब एक से एक बड़ा दानव है। क्योंकि अस्पताल ,पताल तो ठहरा। जिसका अर्थ नरक होता है।सब सजा याफता मजरिम रहते हैं। अपने पिछले जन्मों की,न देनदारिया जबरन लूट लेते हैं।लोगों का अपने आप को लूटवाना ,वहां मजबूरी हैं।सब मौत के डर से दिल खोल के लूट रहे हैं।
काफी समय पहले की बात है।किसी के परिवार का कोई सदस्य बिमार था। मेरा भी ,मरीज को देखने व हाल चाल पूछने वहां जाना पड़ा। यूहीं बातों बातों में ,मरीज के रिश्तेदार ने बात कही कि अच्छा धन्धा है जितना चाहो मांग लो। देना पड़ता है। न कम करते हैं न करवाते हैं कहीं से भी लाकर दो देने पढ़ते हैं। उस समय पूरे शहर में दो चार ही हस्पताल थे । अब तो तकरीबन दो तिहाही भवन इस काम में लगे हैं पूरे शहर के।समय ने व लोगों की गलत इच्छा ने दुनियां नरक बना दी।एक ही बात सुनने को मिलती हैं फलां बिमार है देखने जाना है।लोगों की चाहत, हस्पताल व बिमारी बन गये हैं। यह कल युग है जिसमें इच्छा दिन छिपने से पहले पूरी करनी, भगवान की मजबूरी है। क्योंकि उसके पास समस्यों का अम्बार लगा हैं समय कम है अत: शीघ्र इच्छा पूरी की जाती है। यदि सत युग व दूसरे युग सोते तो करोड़ों बर्ष लगते, इच्छा पूर्ती में।
वहां पर मरीज ठीक करने के लिये नहीं खोले हैं हस्पताल। वह तो उस मोटी कमाई के लिये खोले है तो बिन मांगे व पहले ही रुपये मिलते है इलाज बाद में। कोई झंझट नहीं।अत:लाखों रुपये देकर डिग्री ले लेते है। डा़ का ठप्पा लग गया। कमाई तो ,काम न भी आयेगा, तब भी होगी।एडवांस तो मिलता है।धन्य है तू करोना, कुछ भी ना करो तो भी इतनी मोटी कमाई कि संसार दहल जाये। अब देखे कि फेस मास्क व सनेटाइजर से इतनी कमाई हो गई , चाहे कितने ही देश चला लो। इसे बिमारी से न जोड़े। नहीं तो मौत के मरीज कम कर देगें कमाई।
धन्य है तू भारत , ईमान की न सही, लूट की कमाई के तरीके तो ,बिना फिस बता दिये। नहीं तो प्राइवेट स्कूल वाले फीस ,लाखों की जगह करोड़ों कर देते ।

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