निजी शब्द कितना लोक लुभावन , व्यक्तिगत, स्वार्थी,ताकतवर हैं, इसकी कहानियां व इतिहास सुन व देख कर दुनियां सिहर उठेगें। यही शब्द है जिसके कारण आज तक इतिहास बनते, बिगड़े रहें। लड़ाई,युद्ध ,बंटवारा सब इस शब्द के कारण सोते हैं। यदि इस शब्द की उत्पति नहीं हुई होती तो यह दुनियां कभी भी रक्तरंजित नहीं होती। कितनी मोहकता छुपी है इसमें निज जो आदमी को अपनत्व का अहसास कराता है जब निजी कहलाता है तो कितना खतरनाक रुप धारण कर देता है। यहां अपना कहने वाला ही एक पल की जिन्दगी कर देता है।अपना भी कहता है और दूर भी करता है। यहां उसका निजी मामला कहता है।जब तक रूपये पैसे व फेक्टरी चलानी है तो सब निजी ,लोग मालिक के।चल पड़ी रूपये आये, तो निजी का अर्थ तू न जी, अर्थात बाहर का रास्ता नाप ,तेरा मेरा कोई सम्बंध नहीं।
अब यह शब्द विशालता ग्रहण करता है।जिसे निजीकरण कहते है। यहां शब्द अपनी भंयानकता , दोगलापन ,छिछोरापन,कमीनापन सब दिखाता है, बिना कुछ खर्च किये। सब खर्चों के रूपये,हथियारों व लड़ाई पर खर्च करवाता है ताकि निजी की ताकत का अहसास करवा सके। ताकत के दम पर। ताकत तो रूपयों ने दी है। बस यहीं पर निजीकरण , मार खा जाता है। क्योंकि रुपयें आज तक किसी के नहीं हुये हैं ध्यान से सुन लो। रुपयें तो घमंड के तौर देकर ,फरार हो गये।उनके तो हथियार खरीद लिये।
यह हथियार शब्द है काम का, जिसने इसे गले लगाया।उसका अहंकार क्षण में मिटा दिया। इसकी यारी ऐसी की हाथ कभी नहीं छोड़ता।चाहे मर क्यों न जाये।अब निजीकरण जीने की अभिलाशा छोड़, अलग सम्राज्य के युद्ध के लिये ,युद्ध भूमि में तैयार है। उसे एक अलग देश चाहिए उसकी ताकत बहुत हो गई है , वैसे हजारों पड़े हैं युद्ध भूमि के बाजार में। खरीददार वैसे तो कम हैं लेकिन समय की मंडी में भीड़ लगी पड़ी है।
समय का हथियार तो ऐसा ,अपना कुछ भी खर्च नहीं करता।औरों को मार कर चलता बनता है।भई, समय हम तेरे साथ में, पूर्व की भांति।अब चाहे सारी दुनियां मरे , हमें निजीकरण का डर नहीं। जो महीने में अपने लिए मरने वालों को चार बार मारता है।उसके पास कर्मों रहे। जब रुपयें बहुत-बहुत ज्यादा मात्रा में लोगों के पास हो, उसको आर्थिक मंदी कहते हैं। जो आजकल आई हुई है। उसके दुष्परिणाम करोना जैसे घटनाक्रम समय के हथियार हैं जो स्वयं तो कुछ पैदा नहीं करता, लेकिन उन्हीं के असलाहों से उन्हें धराशाही कर देता है।
अब देखते हैं निजीकरण कि आंधी भारत के कितने टुकड़े करेगी। सतर साल तक भी जो सामाजिक वाद व सहकारी सहयोग की राजनीति कायम न रख सके।पुन: लड़ाई झगड़े की राजनीति ग्रहयुद्ध के रुप में ला रहे हैं। भविष्य में इसके दुष्प्रभाव देखने को अवश्य मिलेगें।बेहतर। होगा नीजिकरण त्याग दें। इजरायल व गाजापट्टी भारत को न बनाये। जो निजीकरण की लड़ाई लड़ रहे हैं।
