ज्ञान एक ऐसी वस्तु है चुराई नहीं जा सकती हैं ,केवल प्रदान किया जा सकता है।वह आज्ञा व शिष्य तत्व के अधिन रह कर। यदि आप चोरी कर किसी की पुस्तक से कुछ हासिल कर सकते हो तो नामुमकिन है। मैं अपने बचपन से आज तक का अनुभव साझा कर रहा हूं। जिसने भी किसी ने किताब की चोरी की है वह उस किताब के एक पन्ने का ज्ञान भी ग्रहण नहीं कर सका। विध्या ग्रहण बीच में ही छोड़ना पड़ा।यदि कोई किसी की किताब लेकर देनी भूल गया। या जान बूझ कर नहीं दी।तो दोनों अवस्था में ,उसको ,समय पर ज्ञान याद नहीं रहेगा। उसे भूलने की बिमारी हो जाती है।
अत: ज्ञान प्राप्त करने से पहले अपने ज्ञान चक्षु खोल कर रखने चाहिए। व ज्ञान प्राप्त करने के लिये संकल्प लेना जरुरी है कि किसी प्रकार के छदम का सहारा न लूंगा। तो जी जीवन परयंत कोई समस्या नहीं पैदा होगी। नहीं तो करण की भांती समय पर शिक्षा काम नहीं आयेगी। सम्पूर्ण विश्व का सबसे महान धनुर्धर होते हुये भी। उसकी जगह, अर्जुन को महान धनुर्धर घोषित कर दिया था। जब कि अर्जुन के तो हाथ पैर कांपते थे युद्ध के नाम से। यह सब जानते हैं। महाभारत के युद्ध की गाथा से। करण के साथ छद्म के बदले छदम हुआ और मारा गया। सब जानते थे कि करण को कोई योद्धा युद्ध में हरा नहीं सकता है।
अब सभी विध्या लेने वालों ने ध्यान रखना है कि किसी प्रकार का छल न करें ताकि भविष्य में आपको व आपके बच्चों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। नहीं तो आपके बच्चे बड़े तो छोड़, भिखारी भी नहीं बन पायेगें। ज्ञान के लिये अपनी पुस्तके खरीद के रखें।बेचे नहीं।उसके संदर्भ की कब जरूरत आन पड़े।अपने पास सहेज कर रखे।जरूरत पढ़ने पर सहारा लिया जा सके। आपकी पहली कक्षा से लेकर आज तक की पढ़ी किताब की कब जरुरत पड़ जाये।कहा नहीं जा सकता।
मुझे तो हजारों बार आवश्यकता पड़ी, लेकिन ढूंढ़ने में बहुत परेशानी हुई। असली वस्तु मिली भी नहीं । बेचने व कुछ और बनाने के बाद।अत : आपसे अनुरोध है कि किसी किताब को लिफाफों में तब्दिल न करे।लिफाफे आपके नहीं होते हैं।न उनसे ज्ञान आपको दोबारा मिल सकता है।यदि आपकी पढ़ी किताब घर रखी है तो उसे आपकी घर वाली व बच्चे , अपने आप ज्ञिग्यासा वश पढ़ लेगें। जो बातें, आपको उन्हें समझाने में वर्षों लगते। वह गर्भ में या अपने आप पढ़ कर सिख लेगें। आपकी जटिल समस्यों का हल आसानी से हो जायेगा।
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