पानी व गुटका खाने से बिमारी व गंदगी फैलती है तो सरकारी तंत्र उसके निर्माण की इजाजत ही क्यों देता हैं। सारी फक्टरियां स्थाई तौर पर बंद करवा देनी चाहिए। इसमें सरकारी की गलत नीति व अज्ञान का जीता जागता उदाहरण है। पान व गुटका शरीर के लिये किसी प्रकार लाभदायक नहीं हैं। ये केवल मांशाहार के दुश्प्रभाव को कम करने के लिये परिक्षण किया गया था जो निष्फल रहा था। वह भी करोड़ो जन्मों पहले। भगवान शिव द्वारा। खावे के बाद पान का बिड़ा दिया जाता था। उसका दुश्प्रभाव भगवान शिव की मूर्तियों व बूतों पर भी देख सकते हैं। शिव जी की मूर्तियों कितनी सड़ी मिलती है। शिव लिंग काले कलूटे व लहूलुहान हर मन्दिर में नजर आते हैं। पहले वह अपनी दवा सुधारने के लिये घंटों धूप में बैठे रहते थे। लेकिन बात नही बनी। फिर बर्फ घंटों बैठे रहते थे। तंग आकर आग के सामने बैठने लगे, परन्तु फिर भी बात नही बनी तो जलकर मरने लगे। तब जाकर उनके शरीर के विषाध कम हुये। शिव जी के भोगों में पान व सुपारी अहम इसिलिये है। शिव मन्दि र के हवन कुंण्ड में पान व सुपारी की आहुती दी जाती है। ताकि वह भंयकर रोग कारक का अन्त कर सके। यह परमंपरा तो कुछ भूखे ब्राहमणों के कारण शुरू की गई है। खानै को कुछ नहीं चढ़ावा आया तो पान व सुपारी से काम चला लिया। पहले तो शिव लिंग भी बाहर धूप में पड़े रहते थे। ताकि सड़े शिव लिंग को सुखा कर ठीक किया था सके। परन्तु कालान्तर में लोगों ने उसे पाखंड का रूप धारण करवा , मकान के भीतर रख लिया। आहुति को आग में न गाल कर, खावे में प्रयोग करने लगे।वह एक आय का श्रोत्र सोने के साथ-साथ बिमारियों का जखिरा बन कर उभर आया।जो आज तक प्रचलित है और भयावह रूप धारण कर चुका हैं।
