आप को जान कर दुःख होगा कि हम इस विज्ञान के दौर में कितना पिछड़ते जा रहे हैं लगता यह है कि हम विकसित होते जा रहे हैं।हमारी अर्थव्यवस्था का मज़ाक उड़ाया जा रहा है। सब कुछ खर्च करने के बाद भी।इसका सीधा सा मतलब है अर्थ व्यवस्था को विश्व स्तरीय न बना कर। केवल देश की सीमाओं के भीतर ही कैद कर रखना। किसी विज्ञापन कम्पनी के विज्ञापन के विश्लेषण से साफ झलकता है।हम किस कदर विदेशी अर्थ व्यवस्था की स्पर्धा में पिछड़ गये है। विमर्श चित्रांकित कार की कीमत से इंगीत होता है। भारत से बाहर 8000 व भारत में 6,00,000 रूपए। यहां फर्क केवल यह है रूपयों की जगह डालर कहा जाता है। है वैसा ही कागज का टुकड़ा। यदि सोने आदि का होता तो न्याय परक लगता। क्या विदेशी कारें इतनी घटिया किस्म की है।या भारतीय कम्पनियां देश के लोगों को लूट रही है। यहां यह मत देखिए कि एक डालर की किस्मत 70 रूपए से अधिक है।उसको भी सब्जी की तरह बेचा जा रहा है। रूपए एक आत्मा व शरीर का रूप है। दोनों देशों के शरीर क्या कभी है जबकि कार तो वहीं है। यदि मान भी लिया जाये फर्क है फिर भारतीय कार की कीमत 8000 रूपये भारत में क्यों नहीं है। वह तो भारत में बनी है। विदेश में नहीं। विदेशी कर व आयात व कस्टम शुल्क भी नहीं चुकाया जाता।देशी कम्पनी लोगों के साथ धोखा कर्मों करती है। यही एकमात्र कारण है जो भारत कभी भी विकसित देश नहीं बनने देगा।
