एक बार की बात है एक आदमी ने किसी दूसरे आदमी से कहा ,” मैं किसी को बेवकूफ बना कर अपना काम निकाल सकता हूं।” दूसरा बोला ,”रहने दे,इतनी बड़ी झूठ मत बोल।”पहले फिर कहा ,तु अजमा कर देख ले। मैं तुझे यू मूरख बना कर ,अपना काम नहीं निकाल लू तो।
दूसरे ने कहा कि तुझे कोई फूटी कोड़ी भी नहीं देगा।चल मैं तुझे ही देखूगा, तू कितना चलाक बनता है।यह बोल , बोल कर वह आदमी चला गया। काफी अरसे के बाद ,वह आदमी,उस दूसरे आदमी के पास आया और बोला दोस्त कैसे हो। वह बोला,” भगवान की कृपा से बिलकुल कुशलतापूर्वक हूं। स्वास्थय भी ठीक- ठाक है।ऊपर वाले ने मौज कर राखी है।”वह बोला ऊपर भी कोई रहता है। क्या कोई किरायेदार रख लिया ।
नहीं, तुम समझे नहीं। मेरे घर के छत के ऊपर की बात नही कर रहा। मैं तो उस मालिक की बात करी रहा हूं।जिसने हमें पैदा किया है। वह बोला, आपको आपकी मां ने नहीं पैदा किया क्या। कुछ देर निरुत्तर रह, वो मनुष्य कहने लगा। माता ने तो हमें शरीर दिया है।जन्म तो उस पर ,आसमान पर बैठे भगवान की वजह से होता हैं। अच्छा
छोड़ इन बातों को। मैं कुछ काम के सिलसिले में आया हूं।देख भाई, मना मत करियो। बहुत मुसिबत में हूं। अच्छा बता क्या बात है। वह झिझक कर बोला, मुझे कुछ रुपयों की जरूरत है। हाथ में आते ही लौटा दूंगा। दूसरा बोला, देख हाथ में लेते ही लौटा दोगें, तो तुम्हें रुपयों कहां जरुरत रही। मैं रूपये तो तुम्हारे हाथ में ही दूंगा।
वह आदमी बोला ,मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है। जब होगे तब लौटा दूंगा।दूसरा बोला यदि हाथ में रुपयें नहीं आये तो ,तुम मेरे रुपये नहीं लौटाओगें। तु मझे बेवकूफ तो नहीं बना रहे हो। दोस्त ऐसी बात ,मैं कैसे सोच सकता हूं की तुम बेवकूफ हो। तुमने ही तो कहा था कि तुम्हें मुर्ख बना कर, अपना काम निकाल लूंगा।उसने कहा, जब तु आ ही गया है तो ,तूझे रूपये दे दूंगा। ये रुपयें अवश्य लौटाने होगे।और वह रूपये लेकर चला गया।
घर पर, वह स्वयं से बोला ,इस बार भी काम निकल गया। वह मूर्ख भी बन गया। रुपयें तो , मेरे पास होते नहीं हैं दूंगा कैसे। कुछ दिनों बाद ,फिर रुपयों की जरुरत आन पड़ी।सोच रहा था ,अब किस को पागल बना कर रुपयें लूं। तभी उसका ध्यान,ऊपर वाले की ओर गया। उसको तो रूपये वापस करने की आवश्यकता नहीं जोती है। वह तो देता ही है ,लेता नहीं हैं। यदि वापस करने की कहेगा तो बोलूगां ,भगवन। आपको रूपयों की क्या जरूरत। रूपयें तो गरीबों को चाहिए होते है।और एक मन्दिर के भगवान के पास चला गया।
वहां दीपक जला व घंटा बजा कर, भगवान का आवाहन किया।आंखों में आंसू भर कर बोला, हे भगवान ,इस दुखिया का दुःख दूर करो। भगवान भी ऐसा।पहली बार, पुकारने पर आ धमका। बोल भगत क्या विपदा हैं। भगवान मुझे कुछ रुपयों की जरुरत है आप दे दो तो मेरी समस्या हल हो जायेगी। सभी लोग रूपये वापस मांगते हैं। मुझे बार बार मांगना न पड़े।जो लाता हूं सब खाने पीने की उधारी में चला जाता है।ऐसे रुपये देना प्रभु , जो वापस न देने पड़े। भगवान बोला ठीक है भगत, तेरी समस्या हल हो जायेगी।
खुश होकर बोला सच भगवान। हां मैं बिलकुल सच कह रहा ,वह रुपये तु मुझे कभी नहीं लौटाना।चहक कर बोला , कहां है, रुपये भगवान, भगवान ने उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में एक अलग तरह की चमक थी।ये रुपये मैं कभी ले जा सकता हूं। भगवान असमझस में पड़ गया। कुछ देर सोच कर बोला तू कभी भी रुपये ले जा सकते हो। तो आप देर न करे प्रभु ,जल्दी दो ।देर हो रही है।
भगवान उसे मन्दिर से बाहर ले आये। और बोला, देख बाहर खेत में फसल खड़ी है ,मेरे खेत में । काट कर , अनाज कुछ मेरे लिये छोड़ कर, बाकि बाजार में बेच कर रूपया तुम ले जा सकते हो । वह रूपया तुम्हें वापिस नहीं करना पड़ेगा। क्योंकि वह तुम्हारी मेहनत का रूपया होगा नहीं, भगवान ऐसा रूपया मुझे नहीं चाहिए।मुझे तो बिना मेहनत का रुपया चाहिए। भगवान ने कहा ,वैसा रुपया तो मेरे पास नहीं है, भगत। मूरख बना कर तुम मौज नहीं कर सकते,भगत। तुम्हारी मेहनत की कमाई ही तुम्हारा कल्याण कर सकती है अब तुम जा सकते हो।
