दोस्तों , आज ऐसे विषय पर लिख रहा हूं।जिस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। लेकिन उस हकीकत को गलत ठहरा नहीं सकता। हर कोई भगवान का प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप में होने की बात से सहमत होगा। किसी भी धर्म ,जाति व सम्प्रदाय के लोग हो।सब अपने -अपने तरीकों से उनकी अराधना करते हैं। किसी न किसी तरह की उम्मीद लेकर जाते हैं। लेकिन वहां सभी की सारी इच्छाएं पूरी नहीं होती है।बल्कि बदले में दंड भी मिलता है। सबसे बड़ा दूर्भाग्य यह है कि अधिकांश मामलों में जान से हाथ धोना पड़ता है।इसको झूठलाया नहीं जा सकता है।
इतिहास मुक गवाह न होकर,मुखर गवाह है कि किसी भगवान ने किसी की जान बचाई हो। चाहे रावण हो या कंश। दोनों शिव जी व कृष्ण जी के उच्च कोटि के उपासक थे। लेकिन दोनो को पूजा करने, आस्था रखने का कोई वरदान न मिला। और मौत की संज्ञा को गले लगा लिआ। अत: आस्था उतनी ही होनी चाहिए कि किसी का बुरा ना हो ,राक्षस जीवित ना बचे व शरीर कर्म करने को ठीक रहे। स्वस्थ शरीर ही,मनुष्य का भगवान होता है।
अपने घर व शरीर में मैल जमा रहे,और पत्थर को नहलाये व दूध पिलाये। ऐसा करने से रोग तो मिल जाता है , परन्तु भगवान कदापि नहीं मिलता।इसलिये अपना मैल धोना चाहिए।ये सब अजमाये वाक्यात है।ये घटनाये रावण के साथ ही नहीं, तुम सभी के साथ व्यतीत हो चुकी हैं। किसी भगवान ने तुम्हरा भाई, बंधु ,रिश्तेदार आज तक नहीं बचाया हैं।फिर भी भूल में सोते हो। अपने स्वास्थ्य का स्वयं का खूद ध्यान रखें।
जिस भगवान से तुम अपने ठीक होने के लिये जाते हो। वह तो समर्थ है अपनी साफ सफाई खूद कर लेता है।गंदगी अपने पास नहीं फटकने देता है। लोगों से उसकी दूरी इतनी ज्यादा है, बिना मरे उसके पास नहीं था सकते।अत: मरने के लिये उनके पास जाने की जरूरत है। वह तो बिना उनके आ जाती है।
