पतिव्रता के जीवण का कोई काम ना रहा धरती के तख्ते पै छतरी जाम ना रहा।।
पतिव्रता का सत टूट्टे तो मोट्टा चाल्आ सै,
आडर रह्ररा दस दिन का पैर पाल्आ सै,
छत्राणी बणै पठाणी ना ज़िन्दगी का गाल्आ सै,
देवलगढ़ का अदली रावण लंका आल्आ सै,
सीता की कैद छुड़ाई वौ राम नाम रहआ,।।
राजपूत की लड़की कैद म्ह पड़ी पूकारै सै
रोजाना की कार वा चिठ्ठी लिख-लिख डारै सै,
सभा दुशासन बरगी रात दिन कुबध विचारै सै
दुष्ट दुशासन द्रोपदी का चीर उतारै सै,
सभा म्हं चीर बढाव वौ व श्याम न रहआ।।
महकदे के नाम के इन्साफ ना रहै,
श्री भगवान कृष्ण के जप और जाप ना रहै,
सगे, असनाई , मित्र,प्यारै खुद आप ना रहै,
मैं जि, के जामी वौ मेरे मां-बाप ना रहै,
चक्रवर्ती इंसाफी राजा जग थाम ना रह्आ,।।
रण कै म्ह शौर मजादै इसी हो आग छत्री कै,
कौण लगादे फैर हाथ शेर और नाग छत्री कै,
गऊमर घंमण्ड और तेग,तोप की पाग छत्री कै,
कहै धनपत सिंग कर्म,धर्म की लाग छत्री कै।
कहै ज़मनादास पिटे बिन मूं,गुलाम ना रहआ।।
