देश के सर्वोच्च न्यायधीश ने पहली बार अच्छा कार्य किया है फांसी की सजा बरकरार रख कर।देश की जनता को थोड़ा विश्वास कानून पर होने की उम्मीद बंध सकती हैं। कानून व राजा को धोखा देने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है। जलाद लोग पहले राजा को बहुत झूठ बोलते थे। किसी अंग का छोटा सा टुकड़ा काट कर , कह देते थे कि हमने इतने छोटे – छोटे टुकड़े कर,लाश जंगली जानवरों व चील-कव्वों को डाल दी है।राजा देखने जाते नहीं थे ,जलाद उन्हें जिन्दा छोड़ देते थे। जलाल का धर्म दया दिखाने का नहीं होता है। अच्छा जलाद , वह होता है जिसको देखते ही अपराधी के प्राण पखेरु उड़ जाये।जिसके हाथ पैर कांपे, वह अच्छा जलाद नहीं बन सकता। फांसी तोड़ते समय जलाल को खुशी होनी चाहिए कि उसने उस धर्म का पालन किया है जिसको करने के लिये मौका बहुत ही कठिनाई से मिलता है।
जैसे आज कल करोना वायरस के हाथ पैर नहीं कांपते हैं , उसने पूरी दुनियां को खौफ जदा कर दिया है तथा अपराधियों को मौत की नींद सुला दिया है। निर्भया जैसे मामलों में तो हर न्याय पसंद को करोना वायरस बन जाना चाहिए। अपराधी कितने भी मरे, कभी दुःखी नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे छोटे-छोटे अपराधो में भी फांसी की सजा बहाल कर दे तो अपराध को झड़ से समाप्त किया जा सकता है। नहीं तो कुदरत का न्याय कौन से जलाद ला धरेगा जमीं पर।यहां हर रोज नये नये जलाद आते हैं।
जैसे कभी हैरीकैन, टरनाडो, ओले व आगजनी जैसे हज़ारो नाम हर दिन सुनने पढ़ते हैं। उनके आगे न किसी वकिल की वकालत काम आती हैं न दया की भीख। सबको दंड देकर जले जाते है, लोग डर कर भाग बेशक चले जाये।उन पर जोर किसी का नहीं चलता हैं। धन्यवाद , कानून के रखवालो।
