हर कोई आज कल रोजगार की तलाश में रहता है। वह हर जगह खोजता फिरता है, अखबार, इन्टरनेट , विज्ञापन , व्यक्ति गत संबंध में, राजनिति में।कुछ भाग्य में लिखा , व कर्म करने की लालशा व भूख से परेशान कुछ करने जाता है चाहे वह ठीक हो या नहीं हो। बहुधा देखने में आता है कि जो ठीक नहीं होता है उसी कार्य को अधिकतर दुनिया के लोग करते हैं। यह रोजमरा का सवाल है। क्योंकि आवश्यकता आविष्कार की जननी नहीं ,असल में भूख आविष्कार की जननी है। यदि भूख नहीं लगती तो किसी भी वस्तु की आवश्यकता कभी भी नहीं हो ती। भूख ने ही मनुष्य को मनुष्य पैदा करने के लिये बाध्य किया है। बच्चे पैदा करने की भूख तो साधू व संन्यासियों में भी बहुत देखने को मिलती है। फरक इतना है इनके बच्चों की गिनती समाज के लोगों मे नहीं जोती है । सड़को पर भीख मांगते हैं व अनाथालय में रहते है। यह एक पुरात्नवादि विचार धारा है। साधू-बाबे रोते गाते रहते है। ”मेरे कुन की बेल चला दे। इसमें कुन का अर्थ परिवार होता हैं। परोक्ष रुप से परिवार चलाते हैं।
किसी भी हैसियत का आदमी हो, उसको हर प्रकार की भूख लगती है। लोग सोचेगें, भूख तो खाना खाने क सामान से मिट जायेगी। परन्तु उस सामान को पैदा करने को क्या-क्या पैदा करना पड़ता है। वह आप सोच भी नहीं सकते। कोई कहेगा। हल ,बीज की जरुरत होती है। लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हैं। भूख मिटाने के लिये ,इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो भूख कारण पैदा न करनी पड़ी हो। चाहे मनुष्य हो या जहाज सब भूख की बदौलत पैदा हुए हैं। क्योंकि जहाज का उपयोग खाने के सामान ढोने ही ज्यादा होता है। वह उनके लिये प्रयोग किया जाता है जो मरने के कगार पर होता है या जैसे दवाईयां और न पैदा होने वाले पदार्थ।
कुछ लोग अजीब तरह के तरीके इस्तेमाल करते रोजगार प्राप्त करने के लिये। जिनका अप्रत्यक्ष तरीके से उपयोग होता हैं। इसके उदाहरण करोड़ो की संख्या मे मिलते है। जैसे नाली व नालों को बंद करना । सड़क पर गंदा पानी छोड़ना। जिससे सड़क व गलियां टूट जाती है। इसमें बार -बार व जल्दी ठेका लेने व ठेकेदार से कमीशन ,रोजगार की गांरटी ली जाती है। ह न अजीब तरीके। भूख मिटाने के लिये बाबे व भिखारी बच्चे पैदा करते हैं। ताकि उनकी भूख मिटाने के लिए कोई भीख मांगने वाला चाहिए। यह एक अच्छा खासा व्यवसाय बन चुका है। कोई भी भिखारी कारों के बिना नहीं चलता।उनका अपना रोजगार तंत्र है।
