न रोना शब्द अच्छा है ,न ही आदत । रोने से आप ही नहीं ,आस पास के लोग तक परेशान हो जाते है। दुःख में रोने का सेहत पर वैसे तो बुरा असर होता है लेकिन किसी रोग या व्याधी के कारण शरीर के मनोभाव पर रोक लगी हो तो ,रोने से स्वास्थय पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।इससे शरीर वेदना मुक्त हो जाता है वह भी तब जब आप बिलकुल अकेले हो ,और रोते हो। यदि आपके पास सहानुभूति देना वाला है तो आपकी समस्या बढ़ सकती है। क्योंकि वेदना व विद्वेग निकालने में सांतवना रोड़ा बनती है। आपके विद्वेग बीच में ही रूक जाते हैं जो काफी खतरनाक होते हैं।
रोने से आँखों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है आँखों की ज्योती तेज होती है।आँखों की पुतली व लेंस पर बहुत ही अच्छा असर होता है रोने का। इससे लेंस आंतरिक स्त्राव से साफ हो जाता है।जिसे आंसू कहते हैं। पुतली की स्कुंचन शक्ति बढ़ती है जिससे रेटिना पर पड़ने वाली प्रतिबिम्ब रोशनी सही जगह पर पड़ती है। इससे साफ दिखाई देने लगता है।
लेकिन डर ,मार व भय के कारण रूलाई आने के बुरे प्रभाव होते है। इनसे आपके शरीर की तंत्र प्रणाली का चोट आदि के भय के कारण, जिस जगह पर मार पड़ती है वहां बचाव में संवेदित ऊर्जा लग जाती है।अतः गलत धारणा न पाले। यदि अकेले में रोना आये तो जी भर कर रो लेना चाहिये। यह अक्सर देखने व सुनने में आता है वह अकेले बैठे रोये जाती या जाता है।पूछने पर कहता है बस यू ही रो रहा था। वे सच बोलते है । उनको भी कारण मालूम नहीं होता है। यह शरीर की रोग दूर करने की स्वभाविक क्रिया है। लेकिन उनके शरीर में काफी आराम महसूस होता है। इस लिये इस प्रकार रोने वाले को रोकना नहीं चाहिये।
