प्याज की की किमत बढती नहीं है बढ़ाई जाती है।जबकि प्याज का पोष्टिक खाने की संग्यान में कोई महत्व नहीं।इसके कारण मुंह से दुर्गंध आता है रेट की बिमारी जिसे वायु रोग कहते हैं यह आपको समाज में हेय नजर से देखने पर मजबूर करता है। लोग नाक व भौह चढ़ाते है। फिर क्यों खाते है लोग इसे। सब्जियां तो प्याज के बैगर हमेशा अच्छी व स्वादिष्ट बनती है।
किमते बढ़ाने का मुख्य कारण चुनाव में दिये गये चन्दें की भरपाई के कारण खुली लूट की छूट देती है।जब तक आयातित प्याज आयेगा तब तक तो लूट ने वाले , लोगों को लूट लेगें। प्याज चाहे तो आयात कर ले। वे भी सस्ते दामों पर आयात कर ,मंहगे पर बेचेगेें। वो भी तो आयात करेगें। सरकार चाहे आयात कर लेंगें। दोहरी लूट करेगें।ये सब बड़े शोपिंग माल वालों का किया धरा है। आप सस्ते में खरीद कर, मंहगे भाव पर बेचते हैं।यदि ये लोग अण्डरग्राऊंड भी न करे तो भी उनके माल में किम्मते पचास से सौ गुणा ज्यादा होती है। वहां पर एक प्याज व एक आलू एक हजार रूपये का बिकता है हर रोज। चाहे बाहर भाव कुछ भी क्यों न हो।प्याज व लहसून खाने में नगण्य वस्तुयें ,उनको किसी प्रकार का महत्व नहीं दोगे तो किमते अपने आप गिर जायेगी। जैसे बादाम अन्य प्रकार के मेवें है कोई नहीं खरीदता है ,पहले गरीब से भी गरीब व्यक्ति इनका प्रयोग करता था। लोग गलियों में रूके मारते फिरते है । अतः प्याज का हालात भी काजू व बादाम की तरह करदो। व्यपारी सब्जियों के साथ मुफ्त में देने को मजबूर हो जायेगे। क्योंकि सिजन निकलते ही पहले सामान की किमत कुछ भी नहीं रहती है। केवल किड़ों का ग्रास बन जाता है।

ग्रहणी यदि प्याज को अहमियत देती है तो उसको पाक शाला का सही ग्यान नहीं है। दूसरा प्याज जैसी बैकार की फसलों की किमत बढती कर व्यपारी किसानों की खेती वाली भूमी निलामी करवाते फिरते है।हर रोज जगह-जगह खरपतवार की तरह कटने वाली कलोनियां , प्याज जैसी अवांछित वस्तुओं से मोटा मूनाफा कमा कर ,लोग रियल स्टेट के व्यपारी बनते हैं। जहां किसान नंगा होकर निलाम होता है। उसे लोग दर -दर का भिखारी बना कर चलते बनते है।
खेती लायक जमीन बनाने में कई जन्म बीत गये , किसानों के, लेकिन कुछ ही सैकंड में जन्मों की मेहनत का जनाजा निकाल कर ,उसे भिखारी बना धक्के खाने को मजबूर देते हैं।जगह -जगह ईंट, टोरड़े व पत्थर बोे दिये। इसमें सबसे गन्दा हाथ है मन्दिर ,मसजिद गुरूद्वारा गिरजाघर बनाने में। उनके आस पास की भूमी पर लोग बेमतलब ही बसने लगते हैं कुछ दिनों बाद गुट बाजी बन जाती है फल स्वरूप दूसरा भगवान और पैदा कर लेते हैं। और जन्म -जन्मान्तर की दुशमन के अड्डे बना कर मर जाते है। हकीकत में भगवान नाम की कोई वस्तु होती नहीं।
सब तुम्हारे मरे पूर्वजों के भूत हैं।
