आजकल आम आदमी का मंहगाई के कारण व बेरोजगारी के कारण जीना बहुत ही कठीन कार्य हो गया है।आदमी काम धंधे की तलाश में मारा मारा फिरता है।कोई काम नहीं मिलता है इसके लिये वह चिन्ता में अपनी सेहत भी गंवा देता है उसे खांस व चिन्ता के कारण तपेदिक जैसे जानलेवा रोग भी गले पड़ जाते हैं।मैं आप को एक ऐसा काम बताऊंगा ,जिसमें आप का एक पैसा भी नहीं लगेगा ,सेहत भी ठीक ठाक रहेगी।आपकी कुछ हद तक की चिन्ता भी दूर हो जायेगी।

बैगर किसी प्रकार की खेती के , आपको सौ, दो सो रूपये बिना किसी रूपये व पैसे के नियोजन के बिना कमी सकते हो।आपकी जेब से केवल खर्च होगा तो केवल घूमना फिरना होगा।नकिसी को किसी प्रकार का प्रतिशत भी नुकसान नहीं होगा।आपको केवल थोड़ा बोझ उठाना पड़ेगा, जिसका वजन केवल पांच दस ग्रांट से लेकर दो चार किलो या आपके सामर्थ्य के अनुसार कर सकते हो।।
रेतली जमीन व बैरानी जमीन पर एक खरपतवार की तरह की एक झाड़ी होती है जिसे अंग्रेजी में स्रब भी कहते हैं। बहुत ज्यादा मात्रा में होती है।लोग इसको जड़ समेत निकाल कर ,खेत की बाड़ करने के शिवाय कुछ और काम नहीं लेते हैं।क्योकि इस में कांटे बहुत मात्रा में होते हैं।अतः इसे बैकार की वस्तु समझ जला देते हैं ताकि खेत साफ व खेती लायक हो सके। यह फसलें नहीं होने देताी है। काम करते वक्त हाथ व पैरों में कांटे चुभ जाते हैं।इसे चाहते एक प्रतिशत लोग भी नहीं,परन्तु बिना चाहे भी ,होती बहुत ही ज्यादा है।
इस झाड़ी की बहुत सारी खासियत हैं। जिनके लाभ लोग ,एक पैसा खर्च किये बैगर ले सकते हैं। यह बालू मिट्टी वाली जमीन में जतना काटोगे उतना ही ज्यादा होगी।यदि इसकी एक भी नर्व जड़ रह जाती है तो यह पुनः पैदा हो जाती है। पानी की एक बूंद भी नहीं चाहिये ,पैदा होने के लिये।यदि इसकी खेती की जाये तो यह एक एेसी पैदावार है जिस पर किसी को एक पैसा भी जेब से खर्च करना नहीं पड़ेगा।इस पर जो फल लगता है ,वह बहुत काम की चीज है।

यह रोग ठीक भी कर सकता है और पैदा भी कर सकता है। इसके फल को बेर कहते हैं लेकिन यह बेर बागवानी वाली बेरी के बेर से बहुत छोटा होता है आकार में। इस बेर में पल्प न के बराबर ही होती है बाद के ऊपर छिलका व पतली सी पल्प होती है। यह खाने में स्वादिस्टता के साथ रोग नाशक भी है।इससे गले के अन्दर होने वाली खरास,गले में चिपचिपापन को खत्म करती है।गले साफ करती हैं यदि बेर हरे रंग के न हो तो।हरे रंग के बेरों से खांसी हो जाती है। इस में विटामिन सी प्रचूर मात्रा में होता है।इसलिये यह शरीर की रोग प्रतिरोधक अक्शमता बढ़ाता है। यह पूर्णरूप से प्रकृति द्वारा पोषित है।किसी प्रकार की किटनाशक का कोई प्रयोग इस नहीं होता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा किसान को यह होता है कि बिना एक पैसा खर्च किये ,खेत की बाड़ की जाती है जो किसान के हजारों रूपये बचाती है।लोहे के तारों की बाड़ का सारा रूपया बच जाता है। किसान खुद की नासमझी के कारण इस अनमोल रतन के लाभ से वंचित है।खेत के चारो ओर हैज के रूप में लगा कर बाड़ करने से खेत की सुन्दरता के साथ बैरों की की फसल भी ले सकते है। इसके लिये पानी की तो जरूरत कतई नहीं। केवल छंटाई के लिये बागवानी वाली कैंची चाहिये ,जो बाड़ की कटाई व छंटाई कर सुन्दर बना सके । जैसे बोगन वेलिया की छंटाई की जाती है।
इसके इलावा इसकी लकड़ी इन्धन के रूप में प्रयोग की जा सकती है ।घर व खेत में धुंआ करने के लिये प्रयोग कर सकते है जो फसलों को किटों के प्रकार से बचाता है।हर रोज सैर करने के बहाने भी घूमने जाते व आते समय सौ, दो रूपये के बेर मुफ्त में लगा कर बेच सकते हो।उनके बाजार में पचास सेअस्सी रूपये किलो बिकते है।नहीं तो अपने रोग ठीक करने के लिये प्रयोग कर सकते हो।

