खाद्य पदार्थों का वितरण सरकार द्वारा किया जा रहा है उसमें देशी गाय या भैंस का घी २ या १ रू किलो मजदूरों को दिया जाना चाहिये ताकि वे स्वस्थ रह कर ठीक ठाक काम कर सके। क्योंकि सेहत ठीक रखने के लिये शरीर में वसा की बहुत जरूरत होती है। ताकि थके बिना लम्बे समय तक काम कर सके।परन्तु कुछ डाक्टर लोगों के गलत व भारमक परचार के का कारण तथा बनियो व दुकानदारों के ठगी करने के इरादे से घी का खाने में इस्तेमाल करने पर घी पैदा करने वालों को रोक कर ,आप खरीद कर खाने लगे हैं। मरे-मरे से बनिये या दुकानदार आजकल मोटे ताजे दिखाई देते है।जबकि शारिरीक काम करने वाले दुकानदारों के निच किसम के बेटों जो डाक्टरी का पैशा करते हैं एक साजिस के तहत बन्ध करवा दिया।
अब मजदूर व आम आदमी बिमार व कमजोर हो गया है। उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे। एक घी व दूध की मना ही करवा कर ,खूद के लिये ढेर सारा घी व दूध ले गये।दूसरा बिमार होगें तो उनके बच्चे के अस्पताल चलेगें। तिसरा निशाना मुफ्त इलाज के चक्कर में जो रूपये पास में है वह भी सस्ती दवाई व बिमा के रूप ले लेगें । यदि आपने बिमारियों के इलाज के लिये बिमा करवा लिया तो बिमारियों पूरी उमर आप का पिछा नहीं छोड़ेगी। हस्पताल के बिस्तर पर ही दम निकलेगा।क्योकि कानून के लिखित रूप का अनुशरण व उपयोग तथा उपभोग अनिवार्य होते है।
गेहूं और चावल जैसे अन्न तो मजदूर अपनी कमाई से भी खरीद सकता है। दोनों को बन्द करके घी व बादाम व काजू ४ से पांच रूपये किलो देने चाहिये। ताकि दिमाग ठण्डा रख कर बिना हड़ताल व तोड़ फोड़ के काम कर सके, जो उनके निमित सरकार व प्रकृति ने दिया है । गैहूं और चावल का इतना ज्यादा उतपादन हो चुका है वह गोदामों में पड़ा सड़ रहा है।यदि पांच वर्षों तक एक भी दाना न उपजे गा तो भी काम चल जायेगा।अतः दालों व तेलों वाली फसलें बो कर अपनी खेती के धन्धे को सुचारू रूप से चला सकते हो।
सरकार के आंकड़े ९० प्रतिशत झूठे होते है।क्योंकि सरकार का अब मूल उद्देश्य गरीबी बढ़ाना है। गरीबों को रूपयें देने का मतलब है गरीबी का महाभंयकर रूप से आगाज करना।यदि सरकार ने गरीब को९ देना है व गरीब ने लेना है तो कर्म बन्धन के शिवाय कुछ न लो। आने वाले समय में रूपयों के बदले में कुछ नहीं आयेगा।यदि काम के बदले खाना पीना मिल गया तो ठीक , नहीं तो भूखे सोना पड़ सकता है।
