किसान कर्ज के बोझ को कम करने व अपनी हमियत बढ़ाने का स्वयं कारगर यह उपाय कर सकता है। जिससे वह अपनी जिन्दगी स्वस्थ तथा बगैर मानशिक तनाव के जी सकता है।
जब तक किसान केवल अपनी जरूरत के ज्यादा फसल पैदा करेगा तब तक किसान की तथा उस की फसलों की बेइज्जती होती रहेगी। जिस दिन किसान ने अपने खाने तक की पैदावार पैदा करनी शुरू कर दी ।उसी दिन से किसान के वारे न्यारे हो जायेगे।मजदूर मुफ्त में काम करने को तैयार हो जायगा।जो आजकल गाड़ी कार में बैठकर और इतने मंहगे भाव कि मजदूरी मांगताहै।सरकार व आढ़ती बेइज्जती करते रहते है़ं आनाज को मण्डियों सूअर खा जाते है।फसल खरीदने से मना कर देते हैं।
इन सब बातों से छूटकारा पाने तथा धरने बंध करने से अच्छा है अपनी आवश्यकता से ज्यादा एक दाना भी न बिजाई करो। पानी ,सपरों ,बुहाई ,कटाई, पर सारा खर्च होता है।कम बिजाई करो ताकि फालतू की दुनिया के बेमतलब के घिसे पिटे नौकर न बनो।जब घर खर्च के लिये एक दो एकड़ तक की खेती करोगे व बाकि खेतखाली छोड़ दोगे तो सरकार व व्यपारी बिना बुलाये किसान के पैरों पर सिर रख कर गिड़गिड़ायेगें।
सरकार से मुफ्त में लेना छोड़ दो , सरकार अगले ही दिन सीधी हो जायेगी बशर्त कि किसान के अपने खाने पिने के लिये ही पैदा करे। और अपने कर्च स्वयं कम करे।किसी और के लिये खाना पैदा करने के लिये तुम मत कर्ज दार बनो। बनिया व सरकार वाताअनुकुलित में बैठकर कर ,किसान की छः महीने की कमाई का मण्डी उपहास उड़ाता है। किसी दुकान पर सामान लेते वो कोई रेट कम नहीं करता , उपर से अनाप शनाप बकते है।
तो किसान भी उन्हीं की तरज पर कम पैदावार करके अपनी मर्जी के तथा तुम्हारे दरवाजे हाथ जोड़कर मर्जी के भाव देगें। ये भूल जाओ कि दूसरे देशों से आनाज मंगालेगें। बाहर भी न फालतू आनाज पैदा करते है न सस्ता है। बाहर से आनाज मंगाने के लिये बिजाई से पहले आर्डर देने पड़ते है। यदि ठीक ठाक पैदा हो गया तो ही मिलेगा। यदि प्राकिरतिक आपदा की भैंट चड़ गया तो भूखे मरो।
अपनी हमियत कम न होने दो। तथा किसी प्रकार का पूजा पाठ न करो तो आपको किसी प्रकार की हानि नहीं होगी। हानि हमेशा पूजा पाठ करने से ही होती है।पूजा के फल स्वरूप देवी देवता पता नहीं किस २ बुरे लोगों के भाग का हिस्सा वचनों पर आधारित बन्ध जाते है और उमर दर उमर दण्ड भोगने पड़ते है।जिसके तुम अधिकारी ही नहीं थे। ऐसा कोई भगवान व देवता किसी भी जगत में नहीं हैं जिसको दिये वचनों की एवज में कुछ भी न देना पड़ता हो।
अपने करमों व भाग की दासता तो स्वीकार की जा सकती है। दूसरे का तो हानि के बराबर का लाभ हर जगत में देना पड़ता है।अतः सरकार व व्यपारी से पूरी भरपाई के वादे के बिना उनके हिस्सों की पैदावार की बिजाई न करो । इस बात को छोड़ देना कि मैं नहीं तो कोई और बो कर फैदा ले लेगा।यह अन्याय सातविक शक्तिया कभी सहन नहीं करता है।
यह सब छुठ है कि इतना धुंआ पराली से हुआ था।यदि था तो आज कहां गया। रात को धुंआ खत्म नहीं हो सकता विग्यान की माने तो।क्योंकि रात की ठँड धुंये को ऊपर जाने नहीं देता जबकि कल रात को धुंआ समाप्त हो गया था।
