हिसार का अर्थ होता है साह पुरूष ,जिस पर कोई उगँली न उठा सके। मुझे दुख ही नहीं आत्म ग्लानि महसूस हो ती है जो अपने पुरूष हो ने पर ग्लानि भरी नजरें उठवाते है।यही किस्सा कल फिर हुआ। एक और किंग फिसर चलाने से पहले बन्द हो ने के कगार पर पहुँच गई।
पहली उड़ान अभी चण्डीगढ़ भी नहीं पहुँची कि रोना शुरू कर दिया ,जहाज कम्पनी ने। सरकार घाटे को पूरा क्यों करेगी ,क्या सरकार के कर्मचारी किराया नहीं देते,करोड़ों रूपये के क्लेम हर रोज सरकारी कर्मचारी करते है।यदि घाटा सरकार ने भरना है तो सरकार ही, पहले की भाँति अपने जहाज खरीद ले। जनता दोहरा बोझ, किराया और टैक्स का क्यों सहन करे।
कोई चीज घाटे में कब आती है,जब उसकी मालिक महा भंयकर रूप से लालची हो जाये।अन्यथा आप मुफ्त में भी कोई धंधा करते हो तो घाटा नहीं होता है। एक जहाज और तिपहिया वाहन में कोई फरक नहीं होता है,फिर उसका किराया,इतना मंहगा करोगे तो कोई नहीं बैठेगा। मज़दूर और भिखारी लोगों की सवारी में राज करनिये बैठने लगेगें तो दिवाला,अवश्य निकलेगा। राजा लोग जनता की समस्यों के लिये जमीनी यातायात के साधन या पैदल रूबरू होते हैं। जनता चील व कव्वे नहीं हैं कि जहाज में बैठकर ,उनसे मारने प्रबंध करना पड़े।
ये जो वायुदूत टैक्सी शुरू की है यह तभी कामयाब हो पायेगी जब इसका किराया साधारण बस के बराबर होगा, चाहे आजमा के देख लो।घाटा तो मालिक को भरना पड़ेगा।हाथी बांधा है तो ख़ाना भी घर से खिलाना पड़ेगा।
