बस की राजनीति सस्ते मानदण्ड

अब लोगों को कुछ नहीं मिला तो शुरू हो गई बसों की राजनीति। इसमें जाता गरीबों का। इसका अर्थ है मतलब निकल गया तो पहचानता नहीं वाली कहै चरितार्थ हो गई। जब तक मजदूरों की जरूरत थी उनका प्रयोग किया। फिर बाहर का रास्ता दिखा दिया। कुछ मजदूर ऐसे हैं सिजन पर आते हैं फिर वापिस चले जाते हैं।

इसमें सरासर गलती यू पी सरकार की है जिसने बसों को बिहार नहीं जाने दिया। और मजदूरों को बीच सड़क पर उतर वा दिया। या वापिस भेज दिया। अब बताओ कि राजस्थान में तो खाने को होता नहीं है वे भी मजदूरी करने दूसरे राज्यों में जाते हैं। तो बताओ वहां पर खाना कहां से आएगा। मिल मालिक व राज नेताओं को ऐसी घिनोनी राजनीति से बचना चाहिए।

रास्ते मत रोको , लोगों को उनके घर जाने दिया जाये। ए तो बस चालक की हिम्मत देखो, लोगों को वहां तक पहुंचाने को तैयार हो गए। ऐसे भंयकर डर में कोई नहीं जाता है। उनको राशनकार्ड पर अनाज तक नहीं मिल सकता है। क्योंकि उनके राशनकार्ड दूसरे राज्यों के हैं। अतिथि भव़ो एक दो दिन तक चल सकता है। जायदा दिन बिना मेहनत के खाना दिया गया तो, वे सब मुफ्त खोर व भिखारी बन जायेंगे। जो समाज पर एक अभिश्राप है। अतः मजदूरों को जाने दे।

सरकार बिमारी को चाहत न बनाएं। इसका दान करोना ही तो है। मूल्यों की राजनीति करें। सस्ते में बिकाउ राजनीति से बचना चाहिए।,,,

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें